सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४६ सूर्य सिद्धान्त उदाहरण १—१६७६ वि० की वसंत पंचमी की अर्द्ध रात्रि को उज्जैन में सूर्य, बुध और गुरु के स्पष्ट स्थान क्या थे ? पहले इनके मन्दोच्च के स्थान जानना है— सृष्टि के आरंभ से १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति तक १,६५,५८,८५,०२३ सौर वर्ष बीते (देखो मध्यामाधिकार) एक कल्प में सूर्य के मन्दोच्च के ३८७ भगण होते हैं; इसलिए १६७६ वि० की मेष संक्रांति तक \frac{१,६५,५८,८५,०२३ \times ३८७}{४,३२००,००,०००} = \frac{१,६५,५८,८५,०२३ \times ४३}{४८,००,००,०००} = \frac{८४१०.३०५५६८६}{४८} = १७५ भगण २ राशि १७ अंश १७' ३१''.१७०३ अर्थात् १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के दिन सूर्य के मन्दोच्च का स्थान था २^{रा} १७^\circ १७' ३१''.१७०३ । मन्दोच्च की गति इतनी कम (सूर्य सिद्धान्त के अनुसार) होती है कि मन्दोच्च का यह स्थान कई वर्ष तक सही माना जा सकता है। \frac{१,६५,५८,८५,०२३ \times ३६८}{४३२ \times १०^७} भगण = \frac{४४६८.५३५५५२६}{२७} भगण = १६६^{भ} ७^{रा} १०^\circ २८' २६.''५४ \therefore १६७६ वि० में बुध के मन्दोच्च का स्थान ७^{रा} १०^\circ २८' २६.''५४ है। इस समय गुरु के मन्दोच्च का स्थान = \frac{१,६५,५८,८५,०२३ \times ६००}{४३२ \times १०^७} भगण = \frac{१६५५८.८५०२३}{४८} भगण = ४०७^{भ} ५^{रा} २१^\circ २२' ३६.''२१ \therefore १६७६ वि० में गुरु के मन्दोच्च का स्थान ५^{रा} २१^\circ २२' ३६.''२१ है।