सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार १४५ स्पष्ट ग्रह=मन्द स्पष्ट ग्रह $\pm$ दूसरा शीघ्रफल =मध्यम ग्रह $\pm$ दूसरा मन्द फल $\pm$ दूसरा शीघ्रफल (८) जिससे सिद्ध होता है कि मध्यम ग्रह में दूसरे मन्द फल को और दूसरे शीघ्र फल को बीज गणित के अनुसार जोड़ दो अर्थात् जो धनात्मक हो उसको जोड़ो और जो ऋणात्मक हो उसको घटाओ । दूसरा मन्द फल और दूसरा शीघ्र फल समीकरण (५) और (७) से जानना चाहिए । संक्षेप में नियम यह हुआ :- (१) शीघ्रफल का आधा चिह्न उलट कर मन्द केन्द्रों में (बीजगणित के अनुसार) जोड़ दो तो प्रथम संस्कृत मन्द केन्द्र आ जावेगा । इसी का मन्द फल प्रथम संस्कृत मन्द फल या पहला मन्द फल है । (२) प्रथम संस्कृत मन्द केन्द्रों में पहले मन्द फल का आधा चिह्न उलट कर जोड़ दो तो दूसरा संस्कृत मन्द केन्द्र आ जावेगा । इसी का मन्द फल दूसरा संस्कृत मन्द फल या दूसरा मन्द फल है । (३) शीघ्र केन्द्र में दूसरा मंद फल चिह्न उलट कर जोड़ दो तो संस्कृत शीघ्र केन्द्र आवेगा, जिसका शीघ्रफल दूसरा शीघ्रफल है । (४) मध्यम ग्रह में दूसरा मंद फल और दूसरा शीघ्रफल बिना चिह्न उलटे जोड़ दो तो स्पष्ट ग्रह आ जावेगा । सूर्य-सिद्धान्त में स्पष्ट ग्रह जानने का यही नियम है। अन्य आचार्यों ने इससे कुछ भिन्न रीति से काम लिया है, जिनकी तुलना करने की कोई आवश्यकता नहीं प्रतीत होती । ऐसे पेंचदार नियम केवल इसलिए बनाए गये थे कि स्पष्ट ग्रह का स्थान ठीक-ठीक ज्ञात हो जाय । इसलिए जिस-जिस नवीन संस्कार से स्पष्ट ग्रह का स्थान प्रायः ठीक-ठीक जाना जा सकता था वह सब काम में लाये जाते थे । इसी लिए आचार्यों के मतों में भिन्नता है । केवल इतने ही नियमों से यथार्थ स्थान नहीं जाना जा सकता है; इसकी परीक्षा आजकल कोई भी कर सकता है; इसलिए मेरा विचार है कि जिन-जिन संस्कारों से यह बात ठीक हो सकती है उनका प्रयोग करना अत्यन्त आवश्यक है । इसी दृष्टि से मैं उन नवीन रीतियों को भी विज्ञान भाष्य में लिखूँगा जिनसे वेध और गणित में समानता आ सकती है । परन्तु पहले कुछ उदाहरण दे देना चाहिये, जिनसे यह सहज ही जाना जा सके कि इन नियमों से स्पष्ट ग्रह कैसे जाना जा सकता है । इसके लिए मैं सूर्य, बुध और गुरु तीन ग्रहों के उदाहरण दूंगा । १०