भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार १५३ यह प्रथम पद में है, इसलिए इसकी ज्या शीघ्र-भुजज्या और ८°५४' की ज्या शीघ्र-कोटिज्या होगी ८१°६' = ८१ × ६० + ६ कला = ४८६६ कला = २१ पिंड १४१' २१ वें पिंड की ज्या = ३३७२' २२ वें पिंड की ज्या = ३४०६' दोनों का अंतर = ३४' २२५ : १४१ : : ३७ : अभीष्ट अंतर ∴ अभीष्ट अंतर = $\frac{१४१ \times ३७}{२२५} = २३'$ ∴ शीघ्र भुजज्या = ३३७२' + २३' = ३३६५' ८°५४' = ८ × ६० + ५४ कला = ५३४ कला = २ पिंड ८४' २रे पिंड की ज्या = ४४६ ३रे पिंड की ज्या = ६७१ अंतर = २२२' ∵ २२५ : ८४ : : २२२ : अभीष्ट अन्तर ∴ अभीष्ट अन्तर = $\frac{८४ \times २२२}{२२५} = ८३'$ ∴ शीघ्र कोटिज्या = ४४६ + ८३' = ५३२' गुरु की शीघ्र परिधि विषम पदान्त में ७२° है, इसलिए पहले की तरह इस बार भी स्फुट शीघ्र परिधि ७२° ही होगी । ∴ शीघ्र भुज फल = $\frac{७२ \times ३३६५}{३६०}$ कला = ६७६' और शीघ्र कोटिफल = $\frac{७२ \times ५३२}{३६०}$ = १०६' यह शीघ्र कोटिफल त्रिज्या में जोड़ा जायगा ।