भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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१५४ सूर्य सिद्धान्त इसलिए, शीघ्र कर्ण = √((३४३८ + १०६)² + ६७६²) = √(३५४४² + ६७६²) = ३६०८′ ∵ दूसरा शीघ्रफल = (३४३८ × ६७६) / ३६०८ [श्लोक ४१, ४२] = ६४७ कला = + १०° ४७′ (२) ∵ नियम (४) के अनुसार, स्पष्ट गुरु = मध्यम गुरु + दूसरा मंद फल + दूसरा शीघ्रफल । = ६^{रा} १६° ५२′ ३७″ - २° ४६′ + १०° ४७′ = ६^{रा} २७° ५३′ ३७″ इस उदाहरण से यह स्पष्ट हो गया होगा कि प्रत्येक ग्रह को स्पष्ट करने के लिए दो बार शीघ्रफल और दो बार मन्द फल निकालना पड़ता है और प्रत्येक के लिए भुजज्या, कोटिज्या, स्फुट-परिधि भुजफल, कोटिफल शीघ्रकर्ण तथा शीघ्रफल निकालना होता है। यदि शून्य से ९०° तक के एक-एक अंश या आधे-आधे अंश को ज्या और कोटिज्या की सारिणी दी हुई हो तो भुजज्या और कोटिज्या सारिणी देखकर जानी जा सकती है। यह सारिणी सब ग्रहों के लिए काम में आ सकती है। इसी प्रकार प्रत्येक ग्रह के मन्द फल और शीघ्रफल की भी सारिणी बनायी जा सकती है जिससे स्पष्ट करने की लम्बी क्रिया बहुत संक्षिप्त हो जायगी और गुणा भाग करने का भी झंझट मिट जायगा । व्यवहार में ऐसा होता भी है । आजकल मकरंद सारिणी अधिक काम में आती है । इसी प्रकार बुध का भी स्पष्ट स्थान जाना जा सकता है। मध्यम बुध का स्थान वही होता है, जो सूर्य का । शीघ्रोच्च का स्थान जानना होता है। और बातें सब उसी प्रकार करनी पड़ती हैं जैसी गुरु के लिए की गयी हैं। उदाहरण देकर पुस्तक का आकार बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं प्रतीत होती । अजादिकेन्द्रे सर्वेषां मान्दे शैघ्ये च कर्मणि । धनं ग्रहाणां लिप्तादि तुलादावृणमेव च ॥४५॥ अनुवाद—(४५) जब शीघ्र केन्द्र या मन्द केन्द्र ६ राशि से कम हो तो शीघ्रफल या मन्दफल धनात्मक होता है, इसलिए सब कामों में जोड़ा जाता है और जब शीघ्र केन्द्र या मन्द केन्द्र ६ राशि से अधिक होता है तब घटाया जाता है।