सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ सूर्य-सिद्धान्त ∵ त (१ - च²) / (१ + च कोज्या स) = त (१ - च कोज्या उ) अर्थात् (१ - च²) / (१ + च कोज्या स) = १ - च कोज्या उ वा १ + च कोज्या स = (१ - च²) / (१ - च कोज्या उ) वा च कोज्या स = (१ - च²) / (१ - च कोज्या उ) - १ = [च (कोज्या उ - च)] / (१ - च कोज्या उ) ∴ कोज्या स = (कोज्या उ - च) / (१ - च कोज्या उ) ∴ १ - कोज्या स = १ - (कोज्या उ - च) / (१ - च कोज्या उ) = (१ - च कोज्या उ + कोज्या उ + च) / (१ - च कोज्या उ) और १ + कोज्या स = (१ - च कोज्या उ + कोज्या उ - च) / (१ - च कोज्या उ) ∴ (१ - कोज्या स) / (१ + कोज्या स) = (१ - च कोज्या उ - कोज्या उ + च) / (१ - च कोज्या उ + कोज्या उ - च) = [(१ - कोज्या उ) (१ + च)] / [(१ + कोज्या उ) (१ - च)] = [(१ + च) / (१ - च)] × [(१ - कोज्या उ) / (१ + कोज्या उ)] ∴ *स्परे² (स / २) = [(१ + च) / (१ - च)] × स्परे² (उ / २) अथवा स्परे (स / २) = √[(१ + च) / (१ - च)] × स्परे (उ / २) (३) यह समीकरण स्पष्ट मंद केन्द्र और उत्केन्द्र के सम्बन्ध प्रकट करता है ।
- किसी कोण की ज्या को उसकी कोटिज्या से भाग देने पर जो कुछ आता है वह उस कोण की स्पर्श रेखा कहलाता है । संक्षेप में किसी कोण म की स्पर्श रेखा को स्परे म लिखते हैं ।