सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 198, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार १७५ $+ \left( \frac{३ च}{२} - ३ च^३ \right) ज्या ४ म + \frac{१५ च^२}{८} ज्या ५ म$ $+ \frac{६च^३}{४} ज्या ६ म + \dots\dots$ इसी तरह, ज्या ४ उ $=$ ज्या ४ म $+$ च ज्या म $\times$ ४ कोज्या ४ म $+ \frac{च^२}{२} \frac{ता}{ताम} ज्या^२ म \times ४ कोज्या ४ म \right}$ $=$ ज्या ४ म $+$ २ च (ज्या ५ म $-$ ज्या ३ म) $+ \frac{च^२}{२}$ (६ ज्या ६ म $-$ ८ ज्या ४ म $+$ २ ज्या २ म) $=च^२ ज्या २ म - २ च ज्या ३ म$ $+ (१ - ४च^२) ज्या ४ म + २ च ज्या ५ म + \dots\dots$ और ज्या ५ उ $=$ ज्या ५ म $+ \frac{५}{२} च ( ज्या ६ म - ज्या ४ म) + \dots\dots$ $= - \frac{५च}{२} ज्या ४ म + ज्या ५म + \frac{५च}{२} ज्या ६ म + \dots$ इस प्रकार समीकरण (च) के उ, ज्या उ, ज्या २ उ इत्यादि के मान तो आ गये परन्तु इसके प, प$^२$, प$^३$ इत्यादि के मान जानना रह गये। यहाँ प $\frac{\sqrt{१+च} - \sqrt{१-च}}{\sqrt{१+च} + \sqrt{१-च}}$ के लिए रखा गया है। इसके किसी घात का विस्तार लैग्रेंज के सिद्धान्त के अनुसार जाना जा सकता है। परन्तु पांच छः घात तक के विस्तार जिनमें च$^७$ से अधिक अंक लाने की आवश्यकता नहीं है द्वियुपद सिद्धान्त (Binomial Theorem) से भी जाने जा सकते हैं जो यहाँ दिखलाये जाते हैं :— प $= \frac{\sqrt{१+च} - \sqrt{१-च}}{\sqrt{१+च} + \sqrt{१-च}}$ $= \frac{१ - \sqrt{१-च^२}}{च}$ $= \frac{१}{च} (१ - \sqrt{१-च^२})$ $= \frac{१}{च} १ - (१-च^२)^\frac{१}{२} \right}$