भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 205, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 205

१८२ सूर्य-सिद्धान्त $=\frac{स्परे (ग गा)}{स्परे (ग प गा)} \times \frac{१\timesकोज्या (प ग)}{कोज्या (ग प गा)\timesज्या (प ग)}$ $=\frac{स्परे (ग गा)}{ज्या (ग प गा)} \times \frac{कोज्या (प ग)}{ज्या (प ग)}$ ज्या (प ग) और कोज्या (प ग) के मानों को समीकरण (ट) में उत्थापन करने से, ज्या (प ग $-$ प गा) $=$ ज्या (प ग) $\times \frac{स्परे (ग गा)}{ज्या (ग प गा)} \times \frac{कोज्या (प ग)}{ज्या (प ग)}$ $\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad\qquad-कोज्या (प ग) \times \frac{स्परे (ग गा)}{स्परे (ग प गा)}$ $=\frac{स्परे (ग गा)\timesकोज्या (प ग)}{ज्या (ग प गा)} - \frac{कोज्या (प ग)\timesस्परे (ग गा)}{स्परे (ग प गा)}$ $=\frac{स्परे (ग गा) कोज्या (प ग)}{ज्या (ग प गा)} १-कोज्या (ग प गा ) \right}$ $=\frac{ज्या (ग गा)}{कोज्या (ग गा)} \times \frac{कोज्या (प ग)}{ज्या (ग प गा)} \times उत्क्रम ज्या (ग प गा)$ परन्तु सूत्र (२) से, $\frac{ज्या (ग गा)}{ज्या (ग प गा)} = ज्या (प ग)$ $\because$ ज्या (प ग $-$ प गा) $=\frac{ज्या (प ग) कोज्या (प ग)}{कोज्या (ग गा)} \times उत्क्रम ज्या (ग प गा)$ बुध को छोड़ कर सब ग्रहों का परम शर ३°.४ से अधिक नहीं है इसलिए इनका इष्टकालिक शर और भी छोटा होगा; जिससे यह मान लेने में कोई अशुद्धि नहीं है कि कोज्या (ग गा) एक के समान है । ऐसी दशा में, ज्या (प ग $-$ प गा) $=$ ज्या (प ग) कोज्या (प ग) $\times$ उत्क्रम ज्या (ग प गा) $=\frac{१}{२}$ ज्या २ (प ग) उत्क्रम ज्या (ग प गा) अर्थात् ज्या (परिणति) $=\frac{१}{२}$ परम शरोत्क्रम ज्या $\times$ ज्या २ (विपातग्रह) (ठ) इस समीकरण से ग्रह और उसके नीच दोनों की परिणित जानकर क्रान्ति- वृत्तीय स्पष्ट केन्द्र जाना जा सकता है । अब यह जानना रह गया कि पृथ्वी के मध्य से ग्रह किस दिशा में और कितनी दूर देख पड़ता है। यह तो स्वयंसिद्ध है कि पृथ्वी से किसी ग्रह की दिशा और दूरी जानने के लिए यह जानना आवश्यक है कि पृथ्वी स्वयं कहाँ है ।