भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार १८१ स्थान और ग गा क्रान्तिवृत्त पर लम्ब है अर्थात् गा ग वृत्त क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव पर जाता है । तब < न र ग कक्षावृत्तीय स्पष्ट केन्द्र तथा र ग की दूरी ग्रह का स्पष्ट कर्ण है जो (छ) और (झ) समीकरणों के अनुसार जाने जाते हैं । न से न ना लम्ब भी क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव पर जाता है । क्रान्तिवृत्त में ना और गा विन्दुओं के बीच की जो दूरी है वही ग का क्रान्तिवृत्तीय स्पष्ट केन्द्र कहलाती है। नेपियर के नियमों के अनुसार प ना और प गा दूरियों को सहज ही जान सकते हैं। फिर दोनों का अन्तर जान लेने से ना गा दूरी (क्रान्तिवृत्तीय स्पष्ट केन्द्र) जानी जा सकती है। परन्तु व्यवहार में सरलता उस समय होती है जिस समय केवल यह जानना रहता है कि प न या प ग में क्या घटाया बढ़ाया जाय कि प ना और प गा का मान निकल आवे । जितना घटाने या बढ़ाने से, पात से ग्रह की क्रान्तिवृत्तीय दूरी निकलती है उसको परिणति कहते हैं। इसलिए यह जानना चाहिये कि परिणति कैसे निकालते हैं। परिभाषा के अनुसार नीच परिणति = प न – प ना ग्रह परिणति = प ग – प गा ग गा को ग्रह का इष्टकालिक शर, < ग प गा को ग्रहका परम शर, प ग को पात से ग्रह की दूरी या विपात ग्रह कहते हैं । < ग गा प समकोण है इसलिए ग प गा गोलीय समकोण त्रिभुज है और नेपियर के नियमों के अनुसार, (१) ज्या (६०° - प ग) = कोज्या (ग गा) × कोज्या प गा (२) ज्या (ग गा) = कोज्या (६०° - ग प गा) × कोज्या (६०° - पग) (३) स्परे (ग गा) = ज्या (प गा) × स्परे (ग प गा) (४) स्परे (प गा) = कोज्या (ग प गा) स्परे (प ग) ज्या (प ग - प गा) = ज्या (प ग) कोज्या (प गा)

  • कोज्या (प ग) ज्या (प गा) (ट) पहले चार सूत्रों से कोज्या (प गा) और ज्या (प गा) के मान परम शर, इष्टकालिक शर और विपात ग्रह में स्थापित करना चाहिए । सूत्र (३) से ज्या (प गा) = स्परे (ग गा) / स्परे (ग प गा) सूत्र (४) से, ज्या (प गा) / कोज्या (प गा) = कोज्या (ग पगा) स्परे (प ग) ∴ कोज्या (प गा) = ज्या (प गा) / [कोज्या (ग प गा) × स्परे (प ग)]