सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
DevanagariHindipublished838 पृष्ठ
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१८० सूर्य-सिद्धान्त ∴ कर्ण = त { ( १ + च²/२ ) - च ( १ - ३/८ च² ) कोज्या म
- च²/२ ( १ - २/३ च² ) कोज्या २ म - ३/८ च³ कोज्या ३ म } (झ) गुरु के कर्ण के लिए समीकरण (झ) का रूप होगा, ५२०२.८ { (१ + .००११६४२) - (.०४८२५४ - .००००४२१) कोज्या म - (.००११६४२ - .०००००१८) कोज्या २ म
- .००००४२१ कोज्या ३ म } अथवा ५२०२.८ (१.००११६४२ - .०४८२११८ कोज्या म
- .००११६२४ कोज्या २ म - .००००४२१ कोज्या ३ म) अथवा ५२०८.८६ - २४१.०६ कोज्या म - ६.०५ कोज्या २ म - .२२ कोज्या ३ म ५२०२.८ सूर्य से गुरु का मध्यम कर्ण है जब कि पृथ्वी का मध्यम कर्ण १००० समझा जाय । इसी तरह अन्य ग्रहों के कर्ण जानने का सूत्र सरल हो सकता है । समीकरण (छ) से ग्रह का जो स्पष्ट केन्द्र आता है वह उसके नीच (Perihelion) से कक्षावृत्त में ग्रह की दूरी होता है। यदि ग्रह का कक्षावृत्त पृथ्वी के कक्षावृत्त अर्थात् क्रान्तिवृत्त के ही धरातल में होता तो यही क्रान्तिवृत्त में भी ग्रह की दूरी होता । परन्तु प्रत्येक ग्रह के कक्षावृत्त का धरातल क्रान्तिवृत्त के धरा- तल से कुछ कोण बनाता है जिसे ग्रह का परम शर कहते हैं और जिसकी चर्चा पहले अध्याय में अंतिम तीन चार श्लोकों में की गयी है इसलिए कक्षावृत्तीय स्पष्ट केन्द्र में कुछ संस्कार करने से क्रान्तिवृत्तीय स्पष्ट केन्द्र आता है। मान लो प ग ग्रह का कक्षावृत्त और प गा क्रान्तिवृत्त है, प ग्रह का उत्तर- पात है, र सूर्य का मध्य है तथा न ग्रह का नीच (Perihelion) हैं। ग ग्रह का स्पष्ट
चित्र ३३