भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 209, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 209

१८६ सूर्य्य-सिद्धान्त देख पड़ता है जो उपर्युक्त रीति से जाना जाता है । इसलिए सूक्ष्मतापूर्वक शुद्ध स्थान जानना हो तो अन्य ग्रहों के आकर्षण के कारण जो परिवर्तन होता है उसका संस्कार भी करना चाहिये । परन्तु यह विषय बहुत गंभीर है। इसकी पूरी जानकारी के लिए भौतिक ज्योतिर्विज्ञान (Physical astronomy), गति विज्ञान (Dynamics), चलन कलन, चलराशिकलन इत्यादि उच्च गणित की जानकारी भी आवश्यक है । इसलिए विस्तार भय से उसका विचार यहाँ नहीं किया जायगा । ऊपर बतलाई गयी रीति से यदि चन्द्रमा का स्पष्ट स्थान निकाला जाय तो देखा जाता है कि बेध द्वारा जाना गया स्थान उससे कभी-कभी तीन-तीन अंश आगे पीछे होता है । इसका कारण यह है कि चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमते हुए इसके साथ सूर्य की परिक्रमा भी एक वर्ष में कर लेता है; इसलिए चंद्रमा पर पृथ्वी के आकर्षण के साथ-साथ सूर्य के आकर्षण का प्रभाव भी बहुत पड़ता है जिससे चंद्रमा का विचलन बहुत बड़ा रूप धारण कर लेता है । इसलिए चंद्रमा के सम्बन्ध में कुछ मुख्य संस्कार करने की आवश्यकता पड़ती है जिनकी चर्चा संक्षेप में की जाती है । सबसे पहले केपलर के नियम के अनुसार जो मंद फल संस्कार करना चाहिए उसका सरल रूप बतला देना आवश्यक है । चंद्रमा की केन्द्रच्युति* १८५४ ई० के आरंभ में ०.०५४८४५२ थी । इसलिए च = ०.०५४८४५२ च² = .००३००७६ च³ = .०००१६४६६ च⁴ = .०००००६०५ च⁵ या इसके आगे की संख्याओं के मान जानने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह अत्यन्त छोटे हैं । च के घातों के इन मानों का समीकरण (छ) में उत्थापन करने से चन्द्रमा के मंदफल संस्कार का रूप यह होगा :- स = म + ( .१०६६८८४ - .००००४१२४ ) ज्या म

  • ( .००३७५६६ - .०००००४१५ ) ज्या म
  • .०००१७८७ ज्या ३ म
  • .०००००६१ ज्या ४ म = म + .१०६६४७१६ ज्या म + .००३७५५७५ ज्या २ म
  • .०००१७८७ ज्या ३ म + .०००००६७ ज्या ४ म यदि म, २ म, ३ म की ज्याओं को आधुनिक रीति से दशमलव भिन्न में लिखा जाय तो ज्या म, ज्या २ म के गुणकों को जो रेडियन में हैं, कलाओं या *देखो Loomi's Practical Astronomy, पृष्ठ ४६२ ।