भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार १६५ हो जाता है जो च्युति और पाक्षिक संस्कारों से जाना जा सकता है, तब यह समझना कुछ कठिन नहीं है कि सूर्य की दूरी पृथिवी से जो वर्ष भर में घटती बढ़ती रहती है उससे भी चंद्रमा के स्थान में कुछ अंतर पड़ जाता है और उपर्युक्त दो संस्कारों से पूरा नहीं होता। इसलिए एक और संस्कार की भी आवश्यकता पड़ती है जिसे वार्षिक संस्कार कहते हैं इसका मुख्य रूप यह है। ११' ४१''.९७ ज्या (सूर्य-मंद-केन्द्र) इस प्रकार चंद्रमा के चार मुख्य-मुख्य संस्कारों की चर्चा संक्षेप में हो गयी और यह भी त्र रूप से बतलाया गया है कि इनके कारण क्या हैं। इनके अतिरिक्त अनेक लघु संस्कार भी हैं जो उच्च-गणित की अच्छी जानकारी बिना समझ में नहीं आ सकते और जिनका आविष्कार गत सौ वर्षों में हुआ है जब कि गणित और वैज्ञानिक यंत्रों की सूक्ष्मता हुई है। पहले बताया गया है कि च्युति-संस्कार का आविष्कारक टालमी है जो विक्रम की दूसरी शताब्दी में यूनान में रहा है। परंतु इसका कारण न्यूटन के पहले नहीं मालूम हो पाया था। पाक्षिक-संस्कार तथा वार्षिक-संस्कार का आविष्कार टाइको ब्राही ने (Tycho Brahe जन्म १४ दि० १५४६, मृत्यु २४ अक्टूबर, १६०१ ई०) अपनी अपूर्व निरूपण-शक्ति से किया था। इसका कारण उसको भी नहीं मालूम हो सका था क्योंकि उस समय तक उच्च गणित का तथा आकर्षण सिद्धान्त का अच्छा ज्ञान नहीं था। तिथि संस्कार का कुछ संकेत अबुल वफ़ा नामक मुसलमान ज्योतिषी ने भी किया था। प्राचीन भारतीय ज्योतिषियों ने मंदफल संस्कार के अतिरिक्त अन्य किसी संस्कार की ओर ध्यान नहीं दिया था। मुंजाल १ ने (८५४ शक० ६८६ वि०) च्युति संस्कार की तरह एक संस्कार तथा एक पाक्षिक-संस्कार की चर्चा की है १. अयं संस्कारश्च "इवेक्शन् वेरियेशन् नामक संस्कारवत् प्रतिभाति । तत्र श्लोकोच । इन्दूच्चोनार्ककोटिघ्ना गत्यंशा विभवा विधोः । गुणो व्यर्केन्दु दोः कोट्यो रूप पञ्चाप्तयोः क्रमात् ॥ फले शशाङ्क तद गत्योर्लिप्ताद्ये स्वर्णयोर्वधे । ऋणं चन्द्रे धनं भुक्तौ स्वर्णं साम्यवधेऽन्यथा ॥ अत्र व्याख्याकारः 'अयं संस्कारस्थिति भ योग साधने न क्रियते पूर्वैरपेक्षितत्वात्' (गणक तरङ्गिणी पृष्ठ २१ पाद टिप्पणी)