भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 219

१६६ सूर्य-सिद्धान्त और नित्यानन्द जी१ ( शक १५६१ वि० १६६६ में ) ने पाक्षिक संस्कार और पात संस्कार की चर्चा की है; परन्तु इनका प्रचार नहीं हुआ । सिद्धान्त-दर्पण से प्रकट होता है कि म० म० चन्द्र शेखर सामन्त ने भी संस्कारों की चर्चा की है । इन चारों संस्कारों के साथ चन्द्रमा सम्बन्धी प्रधान समीकरण का रूप यह होगा :— स = म

  • ३७६′ ५६″.४ ज्या म ⎫
  • १२′ ५४″.७ ज्या २ म ⎪
  • ३६″.६ ज्या ३ म ⎬ मंदफल संस्कार
  • २.″० ज्या म ⎭
  • १° २०′ २६″.५ ज्या [ २ चंद्र - रवि) - म] च्युति संस्कार
  • ३५′ ४१″.६ ज्या २ (चंद्र - रवि) पाक्षिक संस्कार
  • ११′ ११.६७ ज्या (सूर्य मन्द केन्द्र) वार्षिक संस्कार यहाँ स चन्द्रमा का स्पष्ट केन्द्र और म चंद्रमा का मंद केन्द्र है, जब कि मन्द केन्द्र की गणना नीच (perigee) से की गयी है । ज्योतिर्गणित में च्युति और पाक्षिक संस्कार के और पद भी दिये गये हैं जो यहाँ नहीं दिये जाते । च्युति के मंद परिवर्तन के कारण अङ्कों में एकाध कला का अंतर पड़ता जाता है जिसका ध्यान रखना आवश्यक है । आधुनिक ज्योतिष का इतना परिचय देना मेरी समझ में पर्याप्त है । उदाहरण देने से विस्तार बहुत हो जायगा; इसलिए उदाहरण नहीं दिये जाते । कुजार्किगुरुपातानां ग्रहवच्छीघ्रजं फलम् । वामं तृतीयकं मान्दं बुधभार्गवयोः फलम् ॥५६॥ स्वपातोनाद्बृहस्पतेर्शीघ्रात् बुधशुक्रयोः । विक्षेपघ्नाऽन्त्यकर्णाप्ता विक्षेपस्त्रिज्यया विधोः ॥५७॥ अनुवाद—(५६) मंगल, शनि और गुरु के पातों के स्थानों में प्रत्येक के दूसरे शीघ्रफल का संस्कार उसी प्रकार करो जिस प्रकार ग्रह के साथ किया जाता है अर्थात् यदि यह धनात्मक हो तो जोड़ दो और ऋणात्मक हो तो घटा दो । ऐसा १. अत्र मन्दफलातिरिक्तः पाक्षिक नामक संस्कारश्च मध्यम रवि चन्द्रान्तर वशतश्चन्द्रे देयस्तथाऽनेन विधिना जातश्चन्द्रो विमण्डल स्थो भवति...(गणक तरंगिणी, पृष्ठ १०१)