सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार १८७ करने से इन तीन ग्रहों के पातों के स्पष्ट स्थान ज्ञात हो जायेंगे । परन्तु बुध और शुक्र के पातों के स्थानों में प्रत्येक के दूसरे मन्द फल का, जो ग्रह को स्पष्ट करने के लिए तीसरे संस्कार में काम आता है उलटा संस्कार करो अर्थात् यदि धनात्मक हो तो घटा दो और ऋणात्मक हो तो जोड़ दो । ऐसा करने से बुध और शुक्र के स्पष्ट पात ज्ञात हो जायेंगे । (५७) मंगल, शनि और गुरु प्रत्येक के स्पष्ट स्थान में से अपने-अपने पात के स्पष्ट स्थान को घटा दो जो शेष हो उसकी ज्या निकालो और इस ज्या को ग्रह के मध्यम विक्षेप से गुणा करके अन्तिम शीघ्रकर्ण से भाग दे दो तो स्पष्ट विक्षेप या शर ज्ञात हो जायगा । परन्तु बुध और शुक्र के शीघ्रोच्च के स्थानों में से इनके स्पष्ट पात घटाकर शेष की ज्या निकालनी चाहिये और इस ज्या को बुध और शुक्र के मध्यम विक्षेप से गुणा करके अन्तिम शीघ्रकर्ण से भाग देना चाहिये । चन्द्रमा का स्पष्ट शर (विक्षेप) जानने के लिए स्पष्ट चन्द्र के स्थान में से पात (राहु) का स्थान घटाकर शेष को चन्द्रमा के मध्यम विक्षेप से गुणा करके त्रिज्या से भाग दे देने से ही काम हो जाता है । विज्ञान भाष्य—उदाहरण के लिए गुरु का स्पष्ट शर जानने की रीति लिखी जाती है । १६७६ वि० की बसंत पंचमी की अर्द्धरात्रि को उज्जैन में गुरु का स्पष्ट स्थान गणना से जो कुछ आया वह ६ रा, ७° ५३' ३७" है । इसलिए इसी समय का गुरु का स्पष्ट शर निकालना सुगम होगा । एक कल्प में वृहस्पति का पात १७४ भगण करता है, इसलिए १६७६ वि० की वसंत पंचमी के दिन जब कि सृष्टि के आदि से १, ९५, ५८, ८५, ०२३ सौर वर्ष बीते हैं† वृहस्पति के पात का स्थान = १,९५,५८,८५,०२३ × १७४ / ४,३२,००,००,००० = १,९५,५८,८५,०२३ × २९ / ७२,००,००,००० = ७८ भ ६ रा १०° १६' ५८.२" या ६ रा १०° १६' ५८-२" क्योंकि पूरे भगण लिखने की कोई आवश्यकता नहीं है । परन्तु पातों की गति विलोम दिशा में अथवा पच्छिम दिशा में होती है । ────────────────────────────────────────────────── †यह १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति के समय का है परन्तु पात की गति अत्यन्त मन्द होने से इसी को वसंत पंचमी के दिन का भी मान लेने में कोई हानि नहीं है ।