सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार २०३ बतलाया जायगा कि कौन राशि किस जगह कितने समय में उदय होती है । जितने समय में जो राशि जहाँ क्षितिज के ऊपर आती है अर्थात् उदय होती है उसी समय को (नाक्षत्र काल के अनुसार) उस जगह उस राशि के उदय-प्राण या उदयासु कहते हैं। इसलिए यह त्रैराशिक से सहज ही जाना जा सकता है कि जब राशि का उदय उदयप्राण के समान समय में होता है तो उस राशि में ग्रह जितना दिन भर में हटता है उतने का उदय कितने प्राण में होगा । बस नाक्षत्र अहोरात्र की अपेक्षा इतने ही प्राण अधिक बीतने पर मार्गी ग्रह दूसरे दिन क्षितिज में फिर आ जायगा । एक राशि ३० अंश या ३० X ६० या १८०० कला के समान होती है। ग्रह की दैनिक गति भी कला में ही साधारणतः प्रकट की जाती है, इसलिए यह अनुपात हुआ— १८०० कला : ग्रह की दैनिक गति : : राशि का उदय प्राण : इष्ट अन्तर ∵ इष्ट अंतर = (राशि का उदय प्राण X ग्रह की गति) / १८०० कला बस यही अंतर नाक्षत्र अहोरात्र में जो २१६०० प्राणों का होता है जोड़ने से (यदि ग्रह मार्गी हुआ) और घटाने से (यदि ग्रह वक्री हुआ) ग्रह का अहोरात्र ज्ञात होता । इस नियम में थोड़ी सी स्थूलता है । यदि ग्रह क्रान्तिवृत्त पर जिसमें कि राशियाँ होती हैं भ्रमण करता होता तो यह नियम बिल्कुल ठीक होता परन्तु वह तो अपने कक्षावृत्त में घूमता है, जिसके कारण वह या तो क्रान्तिवृत्त के उत्तर होता है या दक्षिण । यदि उत्तर हुआ तो कुछ पहले ही उदय होगा और यदि दक्षिण हुआ तो कुछ पीछे । यदि ग्रह के प्रतिदिन के उदय-काल के विषुवांश ५८ वें श्लोक के विज्ञान भाष्य के समीकरण (४) के अनुसार जान लिए जायं और विषुवांशों के अंतर को प्राणों में बदल दिया जाय तो इसको २१६०० प्राणों में जोड़ने से ग्रह के उदय- प्राण ठीक-ठीक निकलेंगे । आगे के कई श्लोकों में यह जानने की रीति बतलायी गयी है कि अहोरात्र- मान में से कितने समय तक ग्रह क्षितिज के ऊपर रहेगा और कितने समय तक क्षितिज के नीचे अर्थात् ग्रह का दिनमान और रात्रिमान कितने कितने समय के होते हैं। इसके लिए पहले यह जानना आवश्यक है कि ग्रह का चर प्राण कितना है जो नीचे लिखे श्लोकों के अनुसार जाना जाता है :— क्रान्तेः क्रमोत्क्रमज्ये द्वे कृत्वा तत्रोत्क्रमज्यया । हीना त्रिज्या दिनव्यासदलं तद्दक्षिणोत्तरम् ।।६०।।