सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
पृष्ठ 225, कुल 838 में से
संदर्भ में पढ़ें२०२ सूर्य-सिद्धान्त इन दोनों समीकरणों से व ग धनु ओर ग व प कोण जाने जा सकते हैं । फिर समकोण △ ग व च में, नियम (२) के अनुसार ज्या (ग च) = ज्या (व ग) ✕ ज्या (< ग व प + < प व च) (३) और नियम (१) के अनुसार स्पर्श रेखा (व च) = स्पर्श रेखा (व ग) ✕ कोज्या (< ग व प + < प व च) (४) समीकरण (१), (२) और (३) से किसी ग्रह या तारे का विक्षेप और सायन भोगांश ज्ञात हो तो उसकी क्रान्ति जानी जा सकती है और समीकरण (४) की सहायता से उसका विषुवांश जाना जा सकता है । इसी प्रकार यदि विषुवांश और क्रान्ति ज्ञात हों तो सायन भोगांश और विक्षेप भी जाने जा सकते हैं । ग्रहोदयप्राणहता खखाष्टैकोद्धृता गतिः । चक्रासवो लब्धयुता. स्वाहोरात्रासवस्मृताः ॥५६॥ अनुवाद-(५६) ग्रह जिस राशि में हो वह जितने प्राणों में उदय होती हो उसको ग्रह की दैनिक गति से गुणा करके १८०० से भाग देने पर जो कुछ आवे उसको पूरे चक्र के असुओं में जोड़ दिया जाय तो योगफल ग्रह'के अहोरात्र का परिमाण होता है । विज्ञान भाष्य-मध्यमाधिकार के ११-१३ श्लोकों में नाक्षत्र-अहोरात्र, घड़ी, पल, प्राण, सावन दिन इत्यादि की चर्चा विस्तार के साथ की गयी है । वहाँ यह बतलाया गया है कि एक नाक्षत्र अहोरात्र २१६०० असुओं या प्राणों का होता है और सावन दिन नाक्षत्र अहोरात्र से प्रायः ४ मिनट या १० पल या ५६ प्राण अधिक होता है क्योंकि सूर्य प्रति दिन प्रायः १ अंश पूर्व की ओर बढ़ता है जब कि नक्षत्र या तारे एक ही जगह स्थिर रहते हैं। जैसे एक सूर्योदय से दूसरे सूर्योदय तक के समय को सावन दिन कहते हैं उसी प्रकार किसी ग्रह के पूर्व में उदय होने के समय से दूसरे दिन फिर उदय होने तक के समय को उस ग्रह का अहोरात्र कहते हैं । यदि ग्रह मार्गी हुआ तो उसका अहोरात्र नाक्षत्र-अहोरात्र से अधिक और वक्री हुआ तो कम होगा । नक्षत्र अहोरात्र से ग्रह का अहोरात्र कितना अधिक या कम होगा यही जानने की रीति इस श्लोक में बतलायी गयी है । ग्रह दिन भर में जितना आगे चलेगा या पीछे हटेगा उसी के अनुसार ग्रह का अहोरात्र नाक्षत्र-अहोरात्र से अधिक या कम होगा । त्रिप्रश्नाधिकार नामक तीसरे अध्याय में ४१-४३ श्लोकों में यह विस्तार के साथ