सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार २०१ इस रीति को अयुक्त १ कह कर अयन वलन संस्कार करने का आदेश दिया है २ जो विस्तार भय से यहाँ न लिख कर नेपियर के नियमों के आधार पर इस संस्कार की एक सरल रीति लिखी जाती है । सुविधा के लिए चित्र ३६ का सरल रूप चित्र ४० लिया जाता है । इस चित्र में ग ग्रह का स्पष्ट स्थान, ग प ग्रह का स्पष्ट विक्षेप, ग च ग्रह की स्पष्ट क्रान्ति, व प ग्रह का सायन भोगांश, व च ग्रह का विषुवांश, और व ग चित्र ४० परम वृत्त का धनु है । इसलिए स्पष्ट है कि △ ग प व और △ ग च व समकोण गोलीय त्रिभुज है और प व च कोण क्रान्ति वृत्त और विषुष वृत्त के बीच का कोण है जिसे २८वें श्लोक में परम अपक्रम कहा गया है । यदि ग्रह का सायन भोगांश व प और स्पष्ट विक्षेप ग प ज्ञात हो तो नेपियर के नियम (२) के अनुसार समकोण △ ग व प में, कोज्या (व ग) = कोज्या (ग प) × कोज्या(व प) (१) नियम (१) के अनुसार ज्या (व प) = स्पर्श रेखा (ग प) × कोटि स्पर्श रेखा (ग व प) अथवा कोटिस्पर्श रेखा (ग व प) = ज्या (व प) × कोटि स्पर्श रेखा (ग प) (२) १ विक्षेपः कदम्बाभिमुखो भवति । ध्रुवाभिमुख्या क्रान्त्या सह कथं तस्य भिन्न दिक्कस्य योग वियोगावुचितौ । तयोर्यद्भिन्नदिक्त्वं तदायम वलन वशात् ।...... सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय, पृष्ठ २१५ २ गणिताध्याय, पृष्ठ २१७ ।