भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 223

२०० सूर्य्य-सिद्धान्त क्रान्तिवृत्त के उत्तर दिखलाया गया है । यदि ग्रह ग₁ बिन्दु पर हो तो क्रान्ति वृत्त के दक्षिण होगा । क ग प कदम्ब प्रोतवृत्त क्रान्तिवृत्त पर समकोण बनाता है और ध ग च ध्रुव प्रोत वृत्त विषुवद् वृत्त पर समकोण बनाता है । प छ भी ध्रुव प्रोतवृत्त का खंड है और विषुवद् वृत्त पर समकोण बनाता है । ग प, ग का उत्तर विक्षेप, प छ, ग की उत्तर मध्य क्रान्ति और ग च, ग की उत्तर स्पष्ट क्रान्ति है । इसी प्रकार ग₁ प₁, ग₁ ग्रह का दक्षिण विक्षेप, प₁ छा, ग₁ ग्रह की उत्तर मध्य क्रान्ति और ग₁ चा, ग₁ की उत्तर स्पष्ट क्रान्ति है । पहली दशा में मध्य क्रान्ति और विक्षेप दोनों उत्तर हैं, इसलिए इन दोनों को जोड़ने से नियमानुसार स्पष्ट उत्तर क्रान्ति आयेगी । परन्तु दूसरी स्थिति में विक्षेप दक्षिण और मध्य क्रान्ति उत्तर है, इसलिए इन दोनों के अन्तर से स्पष्ट उत्तर क्रान्ति ज्ञात होगी ।

चित्र ३६ यहाँ एक बात विचारणीय है । ग प कदम्ब-प्रोतवृत्त का खण्ड है और प छ ध्रुव-प्रोत वृत्त का; इसलिए इन दोनों का योग ग च के समान नहीं होगा वरन कुछ भिन्न होगा । परन्तु आचार्य ने ऐसा ही लिखा है। इससे यह समझना चाहिये कि आचार्य के विचार में यह भिन्नता इतनी कम समझी गयी है कि इससे जो स्थूलता हो जाती है वह नहीं के समान समझ ली गयी है । भास्कराचार्य जी ने इसीलिए