सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार २०५
ज्यों उत्तर या दक्षिण जाइये त्यों-त्यों पलभा का मान बढ़ता जायगा। उत्तर गोल में पलभा शंकु से उत्तर दिशा में होगी और दक्षिण गोल में दक्षिण दिशा में; इसलिए पलभा से किसी स्थान का अक्षांश सहज ही जाना जा सकता है। हमारे देश में इसीलिए अक्षांश अंशों में प्रकट करने की जगह पलभा की नाप में जो अंगुलों में ली जाती है प्रकट करने की परिपाटी है। ख क ग कोण को ख स्थान का अक्षांश* कहते हैं, इसलिए, अक्षांश की स्पर्शरेखा = ख ग / ख क = पलभा / शंकु = पलभा / १२ (१) इससे स्पष्ट है कि पलभा के ज्ञान से अक्षांश का मान कैसे जाना जा सकता है। हमारे ग्रन्थों में ज्या, कोज्या, और उत्क्रम ज्या के सिवा अन्य त्रिकोणमितीय अनुपातों की चर्चा नहीं है; परन्तु अन्य अनुपातों का काम और रीति से लिया जाता है; जैसे अक्षांश की स्पर्शरेखा का काम पलभा / शंकु से लिया जाता है। द्युज्या, कुज्या और चरज्या को समझने के लिए नीचे लिखे चित्र को देखो—
चित्र ४२
*ऐसा मान लेने से लम्बन के कारण तनिक सी अशुद्धि रह जाती है, जिसका विवेचन तीसरे अध्याय में किया जायगा। परन्तु इस अशुद्धि से कोई हर्ज नहीं हो सकता।