भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 229, कुल 838 में से

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पृष्ठ 229

२०६ सूर्य्य-सिद्धान्त श वह स्थान है जहाँ के लिए देखना है कि ग्रह कितने समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है । उ श द रेखा श स्थान की क्षितिज रेखा तथा ध श धा निरक्ष देश की क्षितिज रेखा है। ध, आकाशीय उत्तरी ध्रुव और धा आकाशीय दक्षिणी ध्रुव है। उ ध ख द धा यामोत्तर वृत्त और ख, श का ख का खास्वस्तिक है। पृथ्वी की दैनिक गति के कारण ग्रह नक्षत्र, सूर्य्य इत्यादि जिस जिस वृत्त पर घूमते हुए दिन में एक परिक्रमा करते देख पड़ते हैं उस-उस वृत्त को उस ग्रह, नक्षत्र, या सूर्य्य का अहोरात्र वृत्त (Diurnal circle) कहते हैं। यह अहोरात्र-वृत्त विषुवत्-वृत्त के समानान्तर१ होते हैं । तीन अहोरात्र वृत्तों के व्यास चित्र ४२ में व वा, वि वी और वु वू रेखाओं से प्रकट किये गये हैं । वि वी अहोरात्र-वृत्त का व्यास विषुवत् वृत्त से मिल जाता है । इस प्रकार वही तारे या ग्रह चलते देख पड़ते हैं जो ठीक विषुवत् वृत्त पर होते हैं। सायन विषुव संक्रान्ति के दिन सूर्य्य भी (यदि इसकी क्रान्ति की गति थोड़ी देर के लिए स्थिर मान ली जाय) इसी अहोरात्र वृत्त पर चलता हुआ देख पड़ता है। यदि किसी ग्रह की उत्तर क्रान्ति व वि धनु के समान हो तो उस ग्रह के अहोरात्र वृत्त का व्यास व वा होगा । इसी तरह यदि ग्रह की दक्षिण क्रान्ति वि वु के समान हो तो उसके अहोरात्र वृत्त का व्यास वु वू होगा । चित्र से प्रकट है कि ध श धा रेखा से जो निरक्ष देश की क्षितिज रेखा है सभी अहोरात्र वृत्त के व्यास दो समान भागों में कट जाते हैं । निरक्ष देश में जब तक सूर्य्य, तारा या ग्रह ध श धा रेखा से ऊपर रहता है तब तक वह देख पड़ता है या उदय रहता है और जब तक वह इस रेखा से नीचे रहता है तब तक नहीं देख पड़ता अथवा अस्त रहता है। इसलिए निरक्ष देश में जहाँ यह रेखा क्षितिज बनाती है सूर्य्य, चन्द्रमा, तारे, सभी - क्रान्ति चाहे जो हो— १२ घंटे तक उदय और बारह घण्टे तक अस्त रहते हैं। इस बारह घण्टे के समय में ६ घण्टे तक तो यह पूर्व क्षितिज से निकल कर ऊपर चढ़ते हुए यामोत्तर-वृत्त पर पहुँचते हैं और ६ घण्टे तक यामोत्तर वृत्त से नीचे उतरते हुए पच्छिम क्षितिज में जा लगते हैं । (प्रकाश वक्री- भवन के कारण जो थोड़ा सा अन्तर पड़ जाता है उसका विचार सुविधा के लिए यहाँ नहीं किया गया है) । निरक्ष देश से उत्तर या दक्षिण के स्थानों में केवल वही ग्रह या तारा आधे दिन तक उदय और आधे दिन तक अस्त रहता है जो विषुवत् वृत्त पर रहता है अर्थात् जिसके अहोरात्र वृत्त का व्यास वि वी से मिलता जुलता है। १. तारे का अहोरात्र वृत्त विषुवत् वृत्त के बिलकुल समानान्तर होता है । सूर्य्य, चन्द्रमा और ग्रहों के अहोरात्र वृत्तों की दिशा में तनिक सा, अन्तर इसलिये पड़ जाता है कि इनकी क्रान्ति सदैव कुछ बदलती रहती है ।

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