भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार २०७ परन्तु जिस ग्रह यह या तारे की क्रान्ति उत्तर होती है वह उत्तर गोल में आधे दिन से अधिक समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है और जिसकी क्रान्ति दक्षिण होती है वह आधे दिन से कम समय तक क्षितिज के ऊपर रहता है। दक्षिण गोल में इसका ठीक उलटा होता है। आधे दिन से कितना अधिक या कम समय तक ग्रह क्षितिज के ऊपर रहता है यह उसकी क्रान्ति के मान पर आश्रित है। यदि क्रान्ति अधिक हुई तो यह अन्तर अधिक होता है और कम हुई तो कम। चित्र में जिस ग्रह की उत्तर क्रान्ति व वि है वह श स्थान पर जिसका अक्षांश ध श उ कोण के समान है उस समय तक क्षितिज के ऊपर रहेगा जितने समय तक यह प से व तक ऊपर चढ़ेगा और फिर वहाँ से उतना ही नीचे उतर कर पच्छिम क्षितिज के नीचे चला जायगा। ऊपर बतलाया गया है कि क से व तक जाने में इसको ६ घण्टे लगेंगे; इसलिए प से क तक ऊपर चढ़ने में जितना समय लगेगा ६ घण्टे से उतना ही अधिक इसको प से व तक जाने में लगेगा क्योंकि क्रान्ति उत्तर होने के कारण ग्रह क्षितिज पर उस समय आवेगा जिस समय वह प विन्दु पर पहुँचेगा। उसके प्रतिकूल यदि दक्षिण क्रान्ति होने से ग्रह के अहोरात्र वृत्त का व्यास वु वू हुआ तो जितनी देर तक वह का से पा तक जायगा ६ घण्टे से उतना ही पीछे वह क्षितिज के विन्दु पा पर पहुँचेगा। अहोरात्र वृत्त के व्यास के प क या पा का खंड को कुज्या या क्षितिज्या और इतना चढ़ने में जितना समय लगता है उसे चर-काल कहते हैं। काल प्रायः पलों या प्राणों में प्रकट किया जाता है इसलिये चर-काल को चर पल, चर प्राण अथवा चर असु कहते हैं। अहोरात्र- वृत्त के व्यासार्ध क व, श वि, या का वु को द्युज्या कहते हैं क्योंकि द्यु के अर्थ हैं दिन, अहोरात्र या प्रकाश। चा श खंड को उत्तर क्रान्ति वाले ग्रह की चरज्या और च श खंड को दक्षिण क्रान्ति वाले ग्रह की चरज्या कहते हैं। चरज्या के धनु को चर खंड और इस धनु की कला को चरप्राण कहते हैं क्योंकि एक चक्र में ३६० x ६० कलाएँ अथवा २१६०० कलाएँ और एक नाक्षत्र अहोरात्र में इतने ही प्राण होते । यहाँ यह याद रखना चाहिए कि ध प चा अथवा धा पा च वृत्तपाद विषुवत् वृत्त से समकोण बनाता हुआ खींचा गया है ? अब देखना है कि चित्र ४२ की सहायता से ६०, ६१ श्लोकों का नियम कैसे सिद्ध होता है । वि श त्रिज्या है, व क द्युज्या, व श वि कोण या व वि धनु ग्रह की क्रान्ति; इसलिये क्रान्ति ज्या = व ल = क श क्रान्ति की उत्क्रम ज्या = वि ल (देखो ११६ पृष्ठ और चित्र २४)