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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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पृष्ठ 23

( २३ ) है, इसलिए प्रक्षिप्त है जिसको किसी ने स्वीकार नहीं किया । यदि सूर्य-सिद्धान्त विदेशी के द्वारा प्राप्त हुआ होता तो ब्रह्मगुप्त अवश्य लिखते, क्योंकि रोमक सिद्धान्त के लिये, जो निस्सन्देह विदेशी है, उन्होंने साफ-साफ लिख दिया है। पंचसिद्धान्तिका प्रकाशिका टीका में म० म० पं० सुधाकर द्विवेदी का दिया हुआ सूर्यारुण-संवाद के मूल का पता नहीं है, इसलिए नहीं कहा जा सकता कि यह किसने लिखा और किस आधार पर लिखा । नित्यानन्द¹ का यह लिखना कि यह कलियुग के ३६०० वर्ष बीतने पर अर्थात् शक ४२१ या ४६६ ई० में लिखा गया जब कि आर्यभट्ट ने अपना आर्यभटीय ग्रन्थ लिखा है, भ्रम है। शायद इसी भ्रम के कारण मुनीश्वर ने भी आर्यभट्ट को सूर्य-सिद्धान्त का रचयिता मान लिया था। अलबेरूनी का यह कहना कि इसको लाटाचार्य या लाटसिंह ने बनाया भ्रम है² क्योंकि वराहमिहिर और ब्रह्मगुप्त किसी ने भी लाटाचार्य को सूर्य सिद्धान्त का रचयिता नहीं माना । वराहमिहिर के अनुसार लाटाचार्य रोमक और पौलिश सिद्धान्तों के व्याख्याता हैं। लाट के अहर्गण³ यवनपुर के सूर्यास्त-काल के हैं। इस प्रकार मत प्रकट है कि सूर्य-सिद्धान्त के रचना काल तथा रचयिता के सम्बन्ध में जितने अनुमान हैं वे सिद्ध नहीं होते । अंतरंग प्रमाणों के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि इसकी वृद्धि ४०० ई० के आसपास से प्रारम्भ होकर १२०० ई० तक समाप्त हुई । पहले-पहल इसका विस्तार ( संशोधन ) वराहमिहिर ने किया होगा । फिर अन्य संशोधकों ने आर्यभट्ट, ब्रह्मगुप्त, मंजुल आदि के वेधों से लाभ उठाकर इसको अप्-टु-डेट (Up-to-date) बनाने की कोशिश की। यह संशोधन उस समय तक जारी था जब तक रंगनाथ जी ने इसकी टीका लिखकर इसके श्लोकों को बाँध नहीं दिया । माधव पुरोहित की टीका में कुछ श्लोक अधिक मिलते हैं, पता नहीं वे किसी पुराने ग्रन्थ के आधार पर लिखे गये या यों ही बढ़ा दिये गये । प्रयाग भ्रातृ-द्वितीया; सं १६६७ वि० महावीर प्रसाद श्रीवास्तव


¹ सूर्य-सिद्धान्त रचनाकालस्तु नित्यान्देन सिद्धान्तराजकृता कलेः षट्त्रिंशच्छ- तमिते अब्दगणे व्यतीते निगद्यते—पंचसिद्धान्तिका प्रकाशिका पृष्ठ २ ²लाटाचार्येणोक्तो यवनपुरेऽर्द्धास्तगे सूर्ये पंच सिद्धान्तिका अध्याय १ श्लोक ३. ³वही अध्याय १५ श्लोक १८.