सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार २०६ यदि समीकरण (५) में क्षितिज्या और द्युज्या की जगह समीकरण (२) और (४) के आधार पर इनके मान उत्थापित किये जायें तो समीकरण (५) का सरल रूप यह होगा :— क्रान्तिज्या × पलभा १ चरज्या = —————————— × ——————— × त्रिज्या १२ क्रान्ति कोटिज्या क्रान्तिज्या पलभा = ——————— × ——— × त्रिज्या क्रान्ति कोटिज्या १२ = क्रान्ति स्पर्श रेखा × अक्षांश स्पर्शरेखा × त्रिज्या (६) अर्थात् किसी स्थान के अक्षांश की स्पर्शरेखा को ग्रह की क्रान्ति की स्पर्श- रेखा से गुणा करके त्रिज्या से गुणा कर दो तो चरज्या आ जायेगी । यदि चरज्या मान दशमलव भिन्न में आजकल की रीति के अनुसार हो तो समीकरण (६) के दाहिने पक्ष में त्रिज्या से गुणा करने की आवश्यकता न पड़ेगी और चरज्या का सरल रूप यह होगा— चरज्या = क्रान्ति स्पर्शरेखा × अक्षांश स्पर्शरेखा (७) इससे यह सिद्ध होता है कि यदि क्रान्ति और अक्षांश ज्ञात हो तो चरज्या सहज ही जानी जा सकती है और द्युज्या, कुज्या इत्यादि जानने के झंझट की आवश्यकता ही नहीं रह जाती । समीकरण (७) की उपपत्ति नेपियर के प्रथम नियम के आधार पर इस प्रकार है :— चित्र ४३ में श उत्तर गोल में एक स्थान है जिसका अक्षांश < उ श ध या उ ध धनु है । उ पू द प, श का क्षितिज-वृत्त है जिसके उत्तर, पूर्व, दक्खिन और पच्छिम बिन्दु क्रम से उ, पू, द और प बिन्दु है । ख खस्वस्तिक, पू वि प विषुववृत्त और ग व गा उस ग्रह या तारे के अहोरात्र-वृत्त का वह खंड है जो क्षितिज के ऊपर रहता है जब ग्रह की क्रान्ति वि व धनु के समान होती है । ग्रह का उदय-बिन्दु ग उस वृहद् वृत्त (great circle) पर है जो आकाशीय ध्रुव ध से विषुववृत्त के च बिन्दु पर लम्ब है । इसलिए जितने समय में ग्रह ग बिन्दु से उदय होकर यामोत्तर वृत्त के व बिन्दु पर पहुँचेगा उतने ही समय में च बिन्दु च से आगे बढ़ता वि तक पहुँचेगा । परन्तु जब तक च पूर्व-बिन्दु पू पर नहीं पहुँच जायगा तब तक यह क्षितिज के नीचे रहेगा । जब वह पू बिन्दु पर आवेगा तब से ६ घंटे पीछे वि पर पहुँचेगा । जितने समय में च बिन्दु च से पू तक जायगा उतना ही पहले ग्रह का उदय ग पर हो चुका रहेगा । इसलिए च पू धनु की ज्या ग्रह की चर १४