भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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२१० सूर्य-सिद्धान्त चित्र ४३ ज्या होगी । इसका परिमाण जानने के लिए नेपियर का पहला नियम बहुत उपयुक्त है क्योंकि ग च पू एक समकोण गोलीय त्रिभुज है जिसका ग च पू कोण समकोण है, ग च ग्रह की क्रान्ति ज्ञात है और ग पू च कोण द पू वि कोण अथवा विद धनु के समान है जो विक्ष धनु अथवा अक्षांश का पूरक कोण है । इसलिए— ज्या (पू च) = स्पर्शरेखा (ग च) × कोटि स्पर्शरेखा < ग पू च, अथवा चर ज्या = क्रान्ति स्पर्श रेखा × अक्षांश स्पर्शरेखा । तन्नाडिका उदक्क्रान्तौ धनं हानिः पृथक्स्थिते । स्वाहोरात्रचतुर्भागे दिनरात्रिदले स्मृते ॥६२॥ याम्यक्रान्तौ विपर्यस्तं द्विगुणे ते दिनक्षपे । विक्षेपयुक्तोनितया क्रान्त्या भानामपि स्वके ॥६३॥ अनुवाद—(६२) उपर्युक्त रीति से जो चर ज्या निकले उसके कलात्मक धनु को यदि क्रान्ति उत्तर हो तो ग्रह के अहोरात्र के असुओं के चौथे भाग में जोड़ने से दिन का आधा और घटाने से रात्रि का आधा होगा । (६३) यदि क्रान्ति दक्षिण हो तो इसके विपरीत होगा अर्थात् चौथे भाग में चर कला घटाने से दिन का आधा और जोड़ने से रात्रि का आधा होगा । दिन या रात्रि के आधे को दुगुना कर देने से दिन-