सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्पष्टाधिकार २११ मान और रात्रिमान ज्ञात हो जायेंगे । इसी प्रकार किसी नक्षत्र अर्थात् तारे का भी दिनमान या रात्रिमान जानने के लिए उसकी मध्य क्रान्ति में विक्षेप को जोड़ या घटा कर जैसी उसकी दिशा हो स्पष्ट क्रान्ति निकालनी चाहिए और स्पष्ट क्रान्ति से चर-काल जान कर दिनमान या रात्रिमान जानना चाहिए । विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों को विशेष समझाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि इनके पहले के श्लोकों की जो व्याख्या की गयी है और उसके लिए जो चित्र दिये गये हैं उनसे इस नियम की उपपत्ति सहज ही सिद्ध हो सकती है । अंतिम पंक्ति में नक्षत्रों की चरज्या और दिनमान तथा रात्रिमान जानने के लिए भी यही नियम दिया गया है जो कि विज्ञान भाष्य में पहले ही आ चुका है । हां स्पष्ट क्रान्ति जानने के लिए विक्षेप को जोड़ने घटाने की बात में वही भूल होगी जो पहले बतलायी गयी है । इसलिए किसी तारे की स्पष्ट क्रान्ति का ज्ञान भी चित्र ४० के आधार पर बतलायी हुई रीति से करना चाहिए । उदाहरण—मान लो किसी तारे की उत्तर क्रान्ति २६°३०′ है तो प्रयाग में उसके दिनमान तथा रात्रिमान क्या होंगे ? (१) सूर्य सिद्धान्त की रीति से— प्रयाग की पलभा* = ५ अंगुल ४१ व्यंगुल = ५.७ अंगुल (स्थूल रीति से) तारे की क्रान्ति = २२°३०′ ∴ क्रान्तिज्या = १३१५ और क्रान्ति की उत्क्रमज्या = २६१′ " ∴ द्युज्या = ३४३८′ – २६१′ = ३१७७′ क्षितिज्या = १३१५ × ५.७ / १२ चरज्या = क्षितिज्या × त्रिज्या / द्युज्या = १३१५ × ५.७ / १२ × ३४३८ / ३१७७ = २५७६६५२६ / ३८१२४ = ६७६′ *प्रयाग की पलभा और अक्षांश ज्योतिर्गणित पृष्ठ ७६ के अनुसार लिये हैं ।