सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ सूर्य-सिद्धान्त ∵ चर कला = ६८१' ∵ चर काल = ६८१ प्राण = ११३ पल ३ प्राण = १ घड़ी ५३ पल ३ प्राण इसको १५ नाक्षत्र घड़ी में जोड़ा क्योंकि क्रान्ति उत्तर है तो दिनमान का आधा = १६ घड़ी ५३ पल ३ प्राण पूर्ण दिनमान = ३३ घड़ी ४७ पल पूर्ण रात्रिमान = २६ घड़ी १३ पल यदि सूर्य का दिनमान या रात्रिमान जानना हो तो सूर्य के अहोरात्र के असुओं के चौथे भाग में चर प्राण जोड़कर दूना करने से दिनमान के असु और घटा- कर दूना करने से रात्रिमान के असु ज्ञात होंगे यदि क्रान्ति उत्तर हो । सूर्य के अहोरात्र के असु ५६वें श्लोक के अनुसार जानना चाहिये । इसी प्रकार ग्रह के अहोरात्र के असुओं के चौथे भाग में चर प्राण जोड़कर दूना करने से दिनमान के असु, और घटाकर दूना करने से रात्रिमान के असु निकलेंगे यदि क्रान्ति उत्तर हो । यह याद रखना चाहिये कि इस प्रकार जो दिनमान या रात्रिमान निकलेंगे वह नाक्षत्र काल की इकाइयों में होंगे । सावन दिन की इकाइयों में बदलने के लिए अलग क्रिया करनी पड़ेगी । एक नाक्षत्र-अहोरात्र २१६०० प्राणों का होता है जबकि एक मध्यम सावन दिन २१६५६.१४ प्राणों का होता है । (२) नवीन रीति से— प्रयाग का अक्षांश २५° २५' तारे की क्रान्ति २२° ३०' ∵ चर ज्या = अक्षांश स्पर्शरेखा × क्रान्ति स्पर्शरेखा = स्पर्शरेखा २५° २५' × स्पर्शरेखा २२° ३०' = .४७५२ × .४१४२ = .१९६८ ∵ चर = ११° २१' = ११३ पल ३ प्राण पृथ्वी की १° गति ४ मिनट, १० पल या ६० प्राणों में होती है । इसलिए ११° २१' चर, ११३ पल और ३ प्राणों के समान रखा गया है । स्पष्ट है कि नवीन रीति के अनुसार काम लेने में द्युज्या, क्षितिज्या इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ती । हाँ स्पर्शरेखा की सारिणी की आवश्यकता अवश्य पड़ती है जो ज्या और कोटिज्या की सारिणियों की तरह बनायी जा सकती है ।