भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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२१४ सूर्य-सिद्धान्त का अंतिम चौथा भाग और श्रवण का पहला पन्द्रहवां भाग अभिजित् का भोग समझा जाता है । इस प्रकार अभिजित का भोग* २५३ १/३ कला का हुआ । प्राचीन काल में २७ नक्षत्रों की जगह अभिजित् को लेकर २८ नक्षत्रों के मान भिन्न भिन्न थे । भास्कराचार्यजी† कहते है कि पुलिश, वशिष्ठ, गर्ग आदि ज्योतिषी विवाह यात्रा आदि के फल की सिद्धि के लिए नक्षत्रों के सूक्ष्म मान यह बतला गये हैं :— चन्द्रमा की मध्यम दैनिक गति ७९०′ ३५″ मानी गयी है । इसका ड्योढ़ा ११८५′ ५२.″५ और आधा ३६५′ १७″.५ होते हैं । विशाखा ┐ पुनर्वसु │ रोहिणी ├ प्रत्येक का भोग ११८४′ ५२.″५ तीनों उत्तरा ┘ आश्लेषा ┐ आर्द्रा │ स्वाती │ भरणी ├ प्रत्येक का भोग ३६५′ १७.″५ ज्येष्ठा │ शतभिज ┘ शेष १५ नक्षत्रों में प्रत्येक का भोग ७९०′ ३५″ है । इन सबके भोगों को जोड़ कर २१,६०० कला में से घटाने पर जो आता है वही अभिजित् का भोग है । इस प्रकार सत्ताईस नक्षत्रों के भोग मिलकर ६ × ३/२ + ६ × १/२ + १५ × १ अथवा २७ मध्यम दैनिक गतियों के समान है, जो = २७ × ७९०′ ३५″ = २७ × (८०० − ९′ ५″) = २१६००″ − २४४′ १५″ इस तरह सिद्ध है कि अभिजित् का भोग २५४′ १५″ है जो मुहूर्त चिंता- मणि के मान से ४५″ अधिक है । इन सब बातों से समझ पड़ता है कि नक्षत्रों के मान प्राचीन काल में चंद्रमा की मध्यम गति के अनुसार तथा नक्षत्र सूचक चमकीले ताराओं को देख कर निश्चित किये गये थे । परन्तु पीछे से जैसे-जैसे ज्योतिष का विकास हुआ तैसे जान पड़ा होगा


*वैश्य प्रांत्यांघ्रिः श्रुति तिथिमागतो ऽभिजित्स्यात् । मुहूर्त चिंतामणि विवाह प्रकरण श्लोक ५५ † सिद्धान्त शिरोमणि गणिताध्याय पृष्ठ १००-१०१