भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार २१५ कि वह विभाग मेल नहीं खाते; इसलिए सुविधा के लिये केवल २७ नक्षत्रों में क्रान्ति वृत्त का विभाग किया गया और प्रत्येक भाग ८०० कला का माना गया। उदाहरण—मान लो यह जानना है कि वसंत पंचमी (१६७६ वि०) के दिन गुरु किस नक्षत्र में थे। गुरु का स्पष्ट भोग = ६^रा २७° ५३' ३७" = २०७° ५४' स्थूल रूप से = १२४७४' इसको ८०० से भाग देने पर लब्धि १५ और शेष ४७४' होते हैं। इसलिए गुरु १५वें नक्षत्र को पार करके १६वें नक्षत्र विशाखा में है और विशाखा का ४७४' भोग चुका है तथा ३२६ कला शेष है। यह जानने के लिए कि वृहस्पति विशाखा में कब तक रहेगा। नियम के अनुसार ३२६ कला को गुरु की दैनिक गति से भाग देना चाहिए। परन्तु वृहस्पति तथा अन्य मंदगामी ग्रहों के लिए यह नियम सूक्ष्म नहीं है क्योंकि ३२६ कला चलने के लिए वृहस्पति को बहुत दिन चाहिए जिसमें उसकी गति एक सी नहीं रहेगी। इसलिए अधिक सूक्ष्म विचार की आवश्यकता है । तिथि के विषय में पहले जो कुछ लिखा गया है वही पर्याप्त है। आगे के ६६वें श्लोक में विशेष चर्चा की जायगी । योग जानने की रीति रवीन्दुयोगलिप्ताभ्यो योगाश्च भोगभाजिताः । गतं गम्यं च षष्टिघ्नं भुक्तियोगाप्त नाडिका ॥६५॥ अनुवाद—(६५) सूर्य और चन्द्रमा के स्पष्ट स्थानों (निरयन भोगांशों) को जोड़कर उनकी कला बनाकर ८०० से भाग देने पर गत योगों की संख्या निकल आती है। शेष से यह जाना जाता है कि वर्तमान योग की कितनी कला बीत गई है। यदि इस शेष को ८०० कला में घटा दिया जाय तो यह ज्ञात होगा कि वर्तमान योग की कितनी कला रह गयी है। इस गत वा गम्य कला को ६० से गुणा करके सूर्य और चंद्रमा की स्पष्ट दैनिक गतियों के योग से भाग दे दिया जाय तो यह ज्ञात होगा कि वर्तमान योग कितनी घड़ी पहले आरंभ हुआ और कितनी घड़ी पीछे समाप्त होगा । विज्ञान भाष्य—अश्विनी के आरंभ से जब सूर्य और चंद्रमा दोनों मिलकर ८०० कला आगे चल चुकते हैं तब १ योग बीतता है, जब १६०० कला आगे चल चुकते हैं तब दूसरा योग बीतता है, इत्यादि । इसी तरह जब दोनों मिलकर ३६०°