सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१८ सूर्य-सिद्धान्त विज्ञान भाष्य — इस काम के लिए भी सूर्य और चंद्रमा को स्पष्ट करना पड़ता है। देखना है कि १६८१ की मेष संक्रान्ति के निकट शनिश्चर की मध्यरात्रि को कौन तिथि वर्तमान थी । शनिवार की मध्यरात्रि को चंद्रमा के स्पष्ट स्थान में से सूर्य का स्पष्ट स्थान घटाने से नहीं घटता है इसलिए चंद्रमा के स्थान में ३६०° जोड़कर योगफल में से सूर्य का स्थान घटाया तो ६५° ४३' ३७" आया । इसी तरह इतवार की मध्यरात्रि के स्थानों का अंतर १०७° २२' ५७" है। दोनों की दैनिक गतियों का अंतर ११° ३६' २०" है। ७२० कला या १२° की एक तिथि होती है इसलिए ६५° ४३' ३७" को १२° से भाग दिया तो लब्धि ५ और शेष ११° ४३' ३७" होता है। इससे प्रकट होता है कि मध्य रात्रि के समय आठवीं तिथि अर्थात् अष्टमी वर्तमान है जिसका ११° ४३' ३७" बीत चुका है और १६' २३" शेष है। इस १६' २३" को ६० से गुणा करके ११° ३६' २०" से भाग दिया तो १ घड़ी २४ पल आया । इसलिए शनीचर की मध्य रात्रि से १ घड़ी २४ पल उपरांत अष्टमी का अंत हुआ । किसी अन्य स्थान में सूर्योदय से तिथि का अंतकाल जानने के लिए वही संस्कार करने पड़ते हैं जो योग के सम्बन्ध में कहा गया है । तिथि योग इत्यादि जानने के लिए जो नियम बतलाये गये हैं वह बड़े कठिन हैं इसलिए व्यवहार के लिए सारणियों का उपयोग किया जाता है जिनसे तिथि योग इत्यादि का आरंभ या अंतकाल जानना बड़ा सुगम हो जाता है । विस्तार भय से सारणी बनाने का सिद्धान्त यहाँ नहीं बतलाया जा सकता । यदि आवश्यकता समझ पड़ेगी तो अंत में परिशिष्ट में बतला दिया जायगा । ध्रुवाणि शकुनिर्नागः तृतीयं तु चतुष्पदम् । किस्तुघ्नं च चतुर्दश्याः कृष्णाया अपरार्धतः ॥६७॥ बवादीनि तथा सप्त चराख्यकरणानि तु । मासेऽष्टकृत्व एकैकं करणं परिवर्तते ॥६८॥ तिथ्यर्धभोगं सर्वेषां करणानां प्रचक्षते । इत्थं स्पष्टगतिः प्रोक्ता सूर्यादीनां खचारिणाम् । ६६। अनुवाद — (६७) शकुनि, नाग, चतुष्पद और किस्तुघ्न चार स्थिर करण प्रत्येक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के उत्तरार्द्ध से आरम्भ हो कर आधी-आधी तिथि तक क्रमानुसार रहते हैं। (६८) उसके बाद बवादि (बव, बालव, कौलव, तैतिल, गरज, वणिज, विष्टि) सात चर करण क्रमानुसार मास में आठ फेर करते हैं । (६६) प्रत्येक