भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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स्पष्टाधिकार २१६ करण का भोग आधी तिथि के समान समझना चाहिये । यहाँ तक सूर्यादि ग्रहों को स्पष्ट करने की रीति कही गयी । विज्ञान भाष्य - स्थिर करणों का जो क्रम यहाँ बतलाया गया है प्रचलित पंचांगों में उससे कुछ विपरीत रहता है । इनमें शकुनि के बाद चतुष्पद तब नाग और किस्तुघ्न लिखे मिलते हैं। इसका कारण क्या है और कब से इस क्रम का आरम्भ हुआ यह विचारणीय है । विष्टि का दूसरा नाम भद्रा है जो शुभ कामों में अशुभ समझी जाती है। प्रत्येक चांद्रमास में किस तिथि को कौन करण भोग करता है यह नीचे की तालिका से प्रकट होगा । प्रत्येक चांद्र मास के करणों का क्रम (सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार) तिथि तिथि का तिथि का तिथि का तिथि का शुक्ल पक्ष शुक्ल पक्ष कृष्ण पक्ष कृष्ण पक्ष पूर्वार्द्ध उत्तरार्द्ध पूर्वार्द्ध उत्तरार्द्ध १ किस्तुघ्न बव वालव कौलव २ वालव कौलव तैतिल गरज ३ तैतिल गरज वणिज विष्टि ४ वणिज विष्टि बव वालव ५ बव बालव कौलव तैतिल ६ कौलव तैतिल गरज वणिज ७ गरज वणिज विष्टि बव ८ विष्टि बव बालव कौलव ९ वालव कौलव तैतिल गरज १० तैतिल गरज वणिज विष्टि ११ वणिज विष्टि बव बालव १२ बव बालव कौलव तैतिल १३ कौलव तैतिल गरज वणिज १४ गरज वणिज विष्टि शकुनि १५ विष्टि बव नाग चतुष्पद शुक्ल पक्ष की १५वीं तिथि की पूर्णिमा और कृष्ण पक्ष को १५वीं तिथि को अमावस्या कहते हैं । पूर्णिमा को १५ और अमावास्या को ३० से सूचित करते हैं । सूर्य-सिद्धान्त के स्पष्टाधिकार नामक दूसरे अध्याय का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ ।