भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 254, कुल 838 में से

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विप्रश्नाधिकार २३१ ज्योतिष में लिखा है कि जब सूर्य श्रविष्ठा या धनिष्ठा नामक नक्षत्र के आदि में होता था तब उत्तरायण का आरंभ होता था और जब सूर्य अश्लेषा नक्षत्र के आधे भाग पर पहुँचता था तब दक्षिणायन का आरंभ होता था । बराहमिहिर बाराही १ संहिता में इसकी चर्चा करते हुए लिखते हैं कि प्राचीन काल में आश्लेषा के आधे पर दक्षिणायन और श्रविष्ठा के आदि पर उत्तरायण होता था परन्तु अब कर्क राशि में प्रवेश करते ही सूर्य दक्षिणायन और मकर राशि में प्रवेश करते ही उत्तरायण होता है । यदि ऐसा न हो तो वेध करके निश्चय करना चाहिए । आजकल दक्षिणायन का आरंभ आर्द्रा नक्षत्र के आरंभ में और उत्तरायण का आरंभ मूल के आधे भाग पर होता है । इस तरह सिद्ध है कि उत्तरायण विन्दु वेदांग ज्योतिष काल में धनिष्ठा के आदि में था और अब मूल के आधे पर । इसलिए स्पष्ट है कि अयन पच्छिम की ओर खसक रहा है। इसके कारण वसंत सम्पात विन्दु या शरद सम्पात विन्दु भी पच्छिम की ओर खसक रहा है। वसंत सम्पात विन्दु के खसकने को यूरोपीय ज्योतिषी precession of equinoxes कहते हैं इसलिए हमारे ज्योतिषियों ने जिस घटना को अयन-चलन के नाम से लिखा है उसी को पाश्चात्य ज्योतिषी precession of equinoxes कहते हैं। भास्कराचार्य जी २ ने अयन चलन और विषुवत्क्रान्ति-वलय- पातचलन दोनों का समान अर्थ किया है । अयन चलन के सम्बन्ध में हमारे प्राचीन ज्योतिषियों के मतों में बड़ी भिन्नता है । सूर्य-सिद्धान्त का मत है कि नक्षत्र चक्र का आदि विन्दु अ लोलक (pendulum) की तरह वसंत सम्पात व के दोनों ओर २७ अंश तक परिलम्बन या आंदोलन करता है (चित्र ४६) । अ को अश्विनी का आदि विन्दु भी कहते हैं । इस आंदोलन का अर्थ यह हुआ कि युग के आरंभ में वसंत सम्पात और अश्विनी का आदि विन्दु एक साथ थे । इसके पश्चात् अश्विनी का आदि विन्दु पूर्व की ओर खसकने लगा और जब वसंत सम्पात से २७ अंश तक आगे बढ़ गया तब यह फिर वसंत सम्पात की १. आश्लेषादर्द्धाद्दक्षिणमुत्तरमयनं रवेर्धनिष्ठाद्यम् । नूनंकदाचिदासीद्येनोक्तं पूर्व शास्त्रेषु ।।१।। साम्प्रतमयनं सवितुः कर्कटकाद्यं मृगादितश्चान्यत् । उक्ताभावे विकृतिः प्रत्यक्ष परीक्षणैर्यक्तिः ।।२।। बाराही संहिता, आदित्यचार पृष्ठ १६, १७ । २. तस्य (विषुवत्क्रान्तिवलयपातस्य) अपि चलनमास्त । येऽयनचलन भागाः प्रसिद्धास्तएव विलोमगस्य क्रान्ति पातस्य भागाः । गोलाध्याय पृष्ठ ५५

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