सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३० सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—(६) एक युग में नक्षत्र-चक्र ६०० बार पूर्व की ओर लोलक की तरह आन्दोलन (oscillation) करता है। इस ६०० को इष्ट अहर्गण से गुणा करके महायुगीय सावन दिनों की संख्या से भाग देने पर जो आवे (१०) उसका भुज बनाकर भुज को ३ से गुणा करके १० से भाग दे दो। ऐसा करने से जो कुछ आवे वही अयनांश कहलाता है। ग्रहों के स्थानों में इसका संस्कार देकर तब ग्रहों की क्रान्ति, छाया, चरदल इत्यादि जानना चाहिये। विज्ञान भाष्य—क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के जिस सामान्य बिन्दु पर उत्तरगामी सूर्य आता है उसको वसंत-सम्पात (vernal equinox) कहते हैं। वसंत- सम्पात से आगे ९० अंश पर जब सूर्य पहुँच जाता है तब उसकी उत्तर की ओर बढ़ने की गति रुक जाती है और दक्षिण की ओर लौटने लगता है। इसी समय दक्षिणायन का आरंभ होता है। इसलिए जिस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य दक्षिण की ओर मुड़ता है उसे दक्षिणायन बिन्दु (summer solstice) कहते हैं। दक्षिणायन के आरंभ से जब तक सूर्य दक्षिण की ओर चलता रहता है तब तक के समय को भी जो ६ मास के समान होता है दक्षिणायन कहते हैं। दक्षिणायन के आरंभ से ३ मास बाद सूर्य विषुवद्वृत्त पर फिर आता है। इस बिन्दु को शरद-सम्पात कहते हैं क्योंकि इसी समय शरद ऋतु का आरंभ होता है। शरद-सम्पात से ९०° आगे तक सूर्य दक्षिण की ओर चलता रहता है फिर उत्तर की लोट पड़ता है। जिस बिन्दु पर पहुँच कर सूर्य उत्तर की ओर लौटने लगता है उस बिन्दु को उत्तरायन बिन्दु (winter solstice) कहते हैं। इसी समय से उत्तरायन का आरंभ होता है। उत्तरायन और दक्षिणायन बिन्दुओं को अयन बिन्दु कहते हैं। चित्र ३६ में व, द, श और उ क्रम से वसंत सम्पात, दक्षिणायन बिन्दु, शरद सम्पात और उत्तरायन बिन्दु हैं। जो वृत्त अयन बिन्दुओं, आकाशीय ध्रुवों और कदम्बों पर हो कर जाता है उसे अयनान्त वृत्त (Solstitial colure) कहते हैं। चित्र ३६ में दा द ध क ऊ उ वृत्त अयनान्त वृत्त है। यह अयन बिन्दु आकाश में सदा एक ही जगह नहीं रहते वरन् पच्छिम की ओर खसक रहे हैं इसलिए जिस नक्षत्र या तारा समूह के पास आजकल उत्तरायण या दक्षिणायन होता है उसी तारे के पास प्राचीन काल में नहीं होता था। वेदांग¹ १. प्रपद्येते श्रविष्ठादौ सूर्याचन्द्रमसावुदक् । सार्पार्धे दक्षिणार्कस्तु माघ श्रावणयोः सदा ॥ याजुष ज्योतिष श्लोक ७ और आर्च ज्योतिष श्लोक ६