भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 838 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 252

त्रिप्रश्नाधिकार २२६ चित्र ४२ में एक एक वृत्त या मंडल के लिये केवल एक एक सीधी रेखा खींची गयी है। हां यामोत्तर वृत्त दोनों में एक ही तरह खींचा गया है । अग्राज्या रेखा प्राच्यपरा साध्या विषुवद्भाप्रगा तथा । इष्टच्छायाविषुवतोः मध्यमग्राऽभिधीयते ॥७॥ अनुवाद—(७) पलभा के अग्र से जानेवाली पूर्व पश्चिम रेखा के समानान्तर रेखा को विषुवद्भाग्रगा रेखा कहते हैं। इष्ट छाया की नोक से विषुवद्भाग्रगा रेखा का जो अन्तर होता है वह अग्रा कहलाती है । विज्ञान भाष्य—चित्र ४५-४६ में जिसको अग्राज्या बतलाया गया है वही यहाँ अग्रा कही गयी है । आचार्य ने कोण और उसके सामने के भुज दोनों को अनेक स्थानों पर अग्रा शब्द से सूचित किया है परन्तु मैं कोण को अग्रा और अग्रा के सामने के भुज को अग्राज्या लिखूँगा जिससे भ्रम न हो । छायाकर्ण शङ्कुच्छायाकृतियुतेर्मूलं कर्णोऽस्य वर्गंतः । प्रोज्झ्य शङ्कुकृतिमूलं छाया शङ्कुर्विपर्ययात् ॥८॥ अनुवाद—(८) शंकु और छाया प्रत्येक के वर्ग को जोड़कर वर्गमूल निकालने से छायाकर्ण आता है। छायाकर्ण के वर्ग में से शंकु के वर्ग को घटाकर वर्गमूल निकालने से [चित्र: शंकु, छाया, छायाकर्ण, चित्र ४८] छाया और छाया के वर्ग को घटाकर वर्गमूल निकालने से शंकु आता है। विज्ञान भाष्य—समकोण त्रिभुज के दो भुज ज्ञात हों तो तीसरा भुज जानने की जो रीति है वही यहाँ शंकु, छाया और छायाकर्ण के सम्बन्ध में भी लागू है। इस श्लोक का सार यह है :— छाया कर्ण = √शंकु² + छाया²; छाया = √कर्ण² – शंकु²; शंकु = √कर्ण² – छाया² अयनांश जानने की रीति त्रिंशत्कृत्या युगे भांशैश्चक्रं प्राक्परिलम्बते । तद्गुणाद्भूदिनैर्भक्ताद् द्युगणाद्यदवाप्यते ॥६॥ तद्दोस्त्रिघ्ना दशाप्तांशा विज्ञेया अयनाभिधाः । तत्संयुक्ताद् ग्रहात्क्रान्तिश्छायाचरदलादिकम् ॥१०॥