सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार २३३
होगी। नियम में अहर्गण से काम लेने को कहा गया है परन्तु मेष संक्रान्ति काल का अयनांश जानने के लिए सौर वर्षों से ही काम लेने में कोई अशुद्धि नहीं हो सकती। कलियुग के आरंभ से १६८२ वि० की मेष संक्रान्ति तक ५०२६ सौर वर्ष होते हैं। इसलिए, ७२०० : ५०२६ : : १ आंदोलन : इष्ट आंदोलन अर्थात्, इष्ट आन्दोलन = ५०२६ / ७२०० = (५०२६ × ३६०) / ७२०० अंश = २५१° १८' यह तीसरे पाद में है। इसलिए स्पष्टाधिकार के ३०वें श्लोक के अनुसार ७१° १८' तीसरे पाद का गत भाग ही भुज हुआ। इसको ३ से गुणा करके १० से भाग देने पर २१°२३' २४" अयनांश होता है। मेष संक्रान्ति से जितनें दिन पीछे का अयनांश जानना हो उतने दिन की गति वर्ष में ५४" के हिसाब से निकाल कर मेष संक्रान्ति काल के अयनांश में जोड़ देने से इष्ट काल का अयनांश ज्ञात हो जायगा। यह स्पष्ट है कि भुज का परम मान ६०° होता है इसलिए यदि इसको ३ से गुणा करके १० से भाग दिया जाय तो २७° आता है जो सूर्य-सिद्धान्त के मत से अयनांश का परम मान है। यहाँ एक बात ध्यान देने की है। ६वें श्लोक में कहा गया है कि नक्षत्र-चक्र पूर्व की ओर परिलम्बन करता है अर्थात् आन्दोलन आरम्भ करने पर पहले वह पूर्व की ओर चलता है। इसलिए जब तक वह वसन्त सम्पात से २७ अंश पूर्व की ओर बढ़ता रहता है तब तक प्रथम पाद में होता है, जब वह पूर्व से वसन्त सम्पात की ओर लौटता रहता है तब तक दूसरे पाद में रहता है, जब तक वसन्त सम्पात से २७ अंश पच्छिम की ओर बढ़ता रहता है तब तक वह तीसरे पाद में रहता है और जब वह पच्छिम से वसन्त सम्पात की ओर लौटता रहता है तब तक चौथे पाद में रहता है। इसलिए ऊपर की गणना से सिद्ध है कि अश्विनी का आदि विन्दु वसन्त सम्पात से २१°२३' २४" पच्छिम है। परन्तु यथार्थ में अश्विनी का आदि विन्दु इस समय वसन्त सम्पात से पूर्व है जैसा कि अगले ११वें श्लोक से भी स्पष्ट होता है इसलिए यह मानना पड़ेगा कि अश्विनी का आदि विन्दु आन्दोलन आरम्भ करने पर पहले पच्छिम की ओर बढ़ता है जो श्लोक के विरुद्ध है। इसलिए जान पड़ता है कि आचार्य