सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ सूर्य-सिद्धान्त ने वसन्त सम्पात को ही अश्विनी के आदि विन्दु के दोनों ओर २७° पूर्व और पश्चिम आन्दोलन करता हुआ माना है और पाठ में किसी कारण गड़बड़ हो गया है। क्योंकि अन्य आचार्यों ने अयनान्त-वृत्त या क्रान्तिपात को ही चलता हुआ माना है। जब १८०० वर्ष में अयन २७ अंश चलता है तब १ वर्ष में ५४ विकला गति होती है। इसलिए सूर्य-सिद्धान्त के मत से दो बातें सिद्ध होती हैं—(१) वसन्त सम्पात अश्विनी के आदि से २७ अंश आगे पीछे हो सकता है तथा (२) इसकी वार्षिक गति ५४ विकला है। अयन-चलन का कारण क्या है यह भारतीय ज्योतिष में कहीं नहीं मिलता। रंगनाथजी ने अपनी गूढ़ार्थ प्रकाशिका टीका में ईश्वर की इच्छा को ही इसका कारण माना है। जो मत सूर्य-सिद्धान्त का है वही सोम-सिद्धान्त, * रोमश-सिद्धान्त, * शाकल्य ब्रह्म-सिद्धान्त,* और लघुवशिष्ठ-सिद्धान्त* का है। द्वितीय आर्यभट* और पराशर* जी ने भी अयन का पूर्ण भगण नहीं माना है, परन्तु इनके मत से वसन्त सम्पात २४ अंश ही मूल बिन्दु से पूर्व पश्चिम जाता है न कि २७°। द्वितीय आर्यभट ने अयनांश जानने की जो रीति बतलायी है उससे जान पड़ता है कि अयन चलन की वार्षिक गति सदा समान नहीं होती। हाँ मध्यम वार्षिक गति ४६.३ विकला मानी गयी है।† पराशर जी ने वार्षिक गति ४६.५ विकला मानी है।† इसके प्रतिकूल मुंजाल १ का मत है कि अयन या वसन्त सम्पात विलोम दिशा में भ्रमण करता हुआ पूरा चक्कर लगाता है और एक कल्प में १,६६,६६६ भगण करता है। इसी को भास्कराचार्य २ जी ने भी माना है। इस हिसाब से अयन की वार्षिक गति ५६.६००७ विकला होती है जो प्रायः १ कला के लगभग है। इसलिए व्यवहार में मुंजाल, भास्कराचार्य, गणेश दैवज्ञ इत्यादि ने १ कला अयन की वार्षिक गति मानी है। वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त इत्यादि ने अयनांश का संस्कार करने की बात नहीं लिखी है। जान पड़ता है कि इनके समय में अयनांश का परिमाण बहुत कम था *भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ३२८ तथा जोगेशचन्द्र राय सम्पादित सिद्धान्त दर्पण का Introduction pp. 39-40 † भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ३३०-३३१ तथा महासिद्धान्त पृष्ठ ६,४५,५७ १. गोलाध्याय पृष्ठ ५४ २. मुंजाल का लघुमानस ६८६ वि० के लगभग बना है (देखो भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ३१३)