सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार २३५ तथा अयन चलन का ज्ञान भी इनको नहीं हुआ था । वराहमिहिर ने तो केवल इतना लिख दिया है कि पहले धनिष्ठा के आदि में उत्तरायण होता था और इनके समय में मकर के आदि में अर्थात् उत्तराषाढ़ के प्रथम पाद पर । इतना और भी कहा है कि यदि विकार हो तो प्रत्यक्ष वेध से काम लेना चाहिए । इसके सिवा अयन जानने का कोई नियम नहीं लिखा है । ब्रह्मगुप्त ने तो कोई संकेत भी नहीं किया है। इसका कारण भास्कराचार्य१ जी यह लिखते हैं कि ब्रह्मगुप्त के२ समय में अयनांश बहुत कम था इसलिए उनको इसका पता नहीं लग सका । वसंत संपात के चलने का ज्ञान यूनानी ज्योतिषी हिपार्कस (Hipparchus) को विक्रम संवत से कोई ७० वर्ष पहले हो चुका था । तारों की सूची बनाने पर इनको ज्ञात हुआ कि इनसे कोई डेढ़ सौ वर्ष पहले जो सूची बनी थी उसकी अपेक्षा इस सूची में वसंत सम्पात से प्रत्येक तारे का अंतर कोई २ अंश अधिक हो गया था । जिससे इन्होंने यह परिणाम निकाला कि वसंत सम्पात पीछे खसक रहा है । इन्होंने वसंत सम्पात की जो वार्षिक गति निकाली थी वह कम से३ कम ३६ विकला थी । वसंत सम्पात की यही गति टालमी४ (Ptolemy) ने विक्रम की तीसरी शताब्दी के आरंभ में निश्चय की । इसके बाद यूनानी ज्योतिष में वसंत सम्पात के चलने के सम्बन्ध में तथा अन्य बातों में भी कोई उन्नति५ नहीं हुई । अलबटानी नामक अरब के एक राजकुमार ने जो एक निपुण ज्योतिषी था ६३७ वि० के लगभग वसंत सम्पात की वार्षिक गति कुछ शुद्धतापूर्वक निश्चय की । शंकर बालकृष्ण दीक्षित६ लिखते हैं कि अलबटानी ने सम्पात चलन की वार्षिक गति ५५.५ विकला निश्चित की थी । इसके बाद नसीरउद्दीन ने७ वर्तमान ईरान के उत्तरी पश्चिमी सीमा के पास वेधालय स्थापित करके वसंत संपात की वार्षिक गति ५१ विकला विक्रम की १४वीं शताब्दी के आरंभ में निश्चय की । १. गोलाध्याय पृष्ठ ५५ । २. जन्म संवत् ६५५ वि०, ब्रह्मस्फुटसिद्धान्त का रचना-काल सम्वत् ६८५ वि० । देखो ब्रह्मस्फुट सिद्धान्त पृष्ठ ४०७ । ३. Berry's Short History of Astronomy pp 51-52 तथा Encyclopaedia Brittanica, Eleventh edition pp. 810. ४. Berry's Short History of Astronomy pp. 68-69. ५. उपरोक्त, पृष्ठ ७३ । ६. भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ३६५ । ७. Berry's History of Astronomy pp. 81-82.