सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ सूर्य-सिद्धान्त मानलो उ व द श क्रान्तिवृत्त और क इसके ध्रुव अर्थात् कदम्ब का छेदक (projection) है। घ विषुवद्वृत्त का उत्तरी ध्रुव (pole) और क ध द अयनान्त- वृत्त (solstitial colure) का छेदक है। प फ घ ब उस मार्ग का छेदक समझो जिस मार्ग से उत्तरी ध्रुव कदम्ब की परिक्रमा अयन चलन के कारण विलोम गति से कर रहा है। दु द्रू क्रान्तिवृत्त के वह बिन्दु हैं जहाँ तक दक्षिणायन बिन्दु द, अयन चलन के कारण परिलंबन करता है इसलिए द से दु या द्रू २७° के अंतर पर है। सिद्धान्त के मत से क ध अर्थात् उत्तरी ध्रुव से कदम्ब की दूरी २४° है। दु और द्रू बिन्दुओं से फ और ब बिन्दुओं पर स्पर्शरेखाएँ दु फ और द्रू ब खींचो जो एक दूसरे को ह बिन्दु पर काटती हैं। जितनी देर में ध ब प फ वृत्त पर ध ३६० अंश चलता है उतनी देर में द बिन्दु द से द्रू तक जाता है, फिर द्रू से द तक लौट कर दु तक पहुँचता है और दु से द तक फिर आ जाता है। इसलिए जब तक ध्रुव कदंब की परिक्रमा करता है तब तक नक्षत्रचक्र ह बिन्दु के दोनों ओर लोलक की तरह आंदोलन करता हुआ देख पड़ता है। परन्तु इससे कुछ संतोष नहीं होता क्योंकि प्राचीन लेखों से यह सिद्ध होता है कि वसंत संपात बिन्दु अश्विनी के आरंभ स्थान से २७ अंश से भी आगे रहा है। शतपथ १ ब्राह्मण में लिखा है कि कृत्तिकाएँ ठीक पूर्व दिशा में उदय होती हैं और अन्य तारे पूर्व दिशा से हटकर उदय होते हैं जिससे स्पष्ट है कि उस समय कृतिकाएँ ठीक विषुवद्वृत्त पर थीं। आजकल यह प्रयाग में कोई २७° उत्तर उदय होती हैं। इससे यह गणना की जा सकती है कि जिस समय कृत्तिकाएँ विषुवद्वृत्त पर थीं उस समय वसंत सम्पात बिन्दु कहां था। कृत्तिका के योग तारा (n – Tauri) का भोग ३६°६' और शर प्रत्यक्ष बेध २ से ४°२' होता है। यदि क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच का कोण (परम अपक्रम) २४° मान लिया जाय तो यह सहज ही जाना जा सकता है कि शतपथ ब्राह्मण काल में कृत्तिका का भोग वसंत सम्पात से क्या था। चित्र ५१ में व आजकल का वसंत सम्पात बिन्दु और प व पा विषुवद् वृत्त है। और वा शतपथ-ब्राह्मण काल का वसंत सम्पात बिन्दु तथा च कृ वा विषुवद् १. एकं द्वे त्रीणि चत्वारीति वा अन्यानि नक्षत्राण्यथैता एव भूयिष्ठा यत्कृत्ति कास्तद्भूमानमेवैतदुपैति तस्मात्कृत्तिका स्वादधीत ॥२॥ 'एता ह वै प्राच्यै दिशो न च्यवंते सर्वाणि ह वा अन्यानि नक्षत्राणि प्राच्यै दिशश्च्यवंते तत्प्राच्यामेवास्यैतद्दिश्या हितो भवतस्तस्मात् कृत्तिका स्वादधीत ॥ ३ ॥ शतपथ ब्राह्मण २. १.२. [भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ १२७ में उद्धृत] २. भारतीय ज्योतिष शास्त्र पृष्ठ ४५५ ।