भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार २३७ ५०″.२४५३—०.००० २२२५×(१६०७—६८६) =५०″.२४५३—.२०४३ =५०″.०४१ रही होगी । इससे प्रकट है कि हमारे आचार्यों ने अपने स्वतंत्र और निराले ढंग से अयन की गति इतनी सूक्ष्म निकाली थी कि वह सत्य से केवल १.५६८ विकला अधिक थी जो उस समय के स्थूल यंत्रों के विचार से बहुत ही सराहनीय है । अब संक्षेप में इस बात पर विचार किया जायगा कि अयन की गति लोलक की गति की तरह होती है जैसा कि सूर्य-सिद्धान्त, सोम-सिद्धान्त, पराशर-सिद्धान्त और उ चित्र ५० महासिद्धान्त का मत है अथवा पूर्ण भ्रमण होता है जैसा कि मुंजाल या भास्कराचार्य इत्यादि का मत है । सूर्य-सिद्धान्त आदि ग्रन्थों में यह नहीं लिखा मिलता कि अयन की गति लोलक की गति की तरह क्यों होती है । ब्रेनैड¹ ने और शायद इन्हीं के आधार पर विज्ञानानन्द² स्वामी ने इसको समझाने का प्रयत्न इस प्रकार किया है:— १. Brennand’s History of Hindu Astromomy, London 1896. २. श्री सूर्य-सिद्धान्त बङ्गानुवाद तथा टीका, कलकत्ता १६०६ ई०