भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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२४० सूर्य-सिद्धान्त इसलिए यह सिद्ध है कि वसंत सम्पात बिन्दु शतपथ ब्राह्मण के समय जहाँ था उससे इस समय ६७°५६' पच्छिम है। परन्तु सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार वसंत सम्पात बिन्दुओं का महत्तम अंतर ५४° से अधिक नहीं होना चाहिये। इसलिए यह सिद्ध होता है कि सूर्य-सिद्धान्त का यह मत है कि वसंत सम्पात बिन्दु मध्यम स्थान से २७° पूर्व और पच्छिम जाता है ठीक नहीं है। इस संबन्ध में केई¹ महाशय कहते हैं कि कृत्तिका से कृत्तिका तारापुंज (Pleiades) को नहीं समझना चाहिये वरन् वसंत सम्पात को समझना चाहिये जैसे आजकल युरोपीय विद्वान सायनमेष (First point of Aries) को समझते हैं। ऐसा मानने से शतपथ ब्राह्मण काल उतना प्राचीन नहीं ठहरता जितना पूर्वोक्त गणना से ठहरता है। पूर्वोक्त गणना से शतपथ ब्राह्मण का समय आज से कोई ४८६७ वर्ष पूर्व अथवा विक्रम से २८८५ वर्ष पूर्व सिद्ध होता है जो केई महाशय को असम्भव जान पड़ता है। परन्तु मेरी समझ में केई महाशय भ्रम में हैं। पूर्वोक्त अवतरण में जहाँ कृत्तिका शब्द आया है वहां इसका प्रयोग बहुवचन में है जिससे प्रकट है कि कृत्तिका का अर्थ कृत्तिका तारा पुंज है जिसमें कोरी आँख से ६ तारे देख पड़ते हैं। यदि इसका अर्थ वसंत सम्पात बिंदु होता तो बहुवचन में प्रयोग कदापि न होता। इसके सिवा यह विचार करने की बात है कि जब कृत्तिका उसी नाम के तारापुंज को न समझकर वसंत सम्पात बिंदु को समझा जाय तो क्या इस बिंदु को देखकर पूर्व दिशा का ज्ञान हो सकता है ? क्या आजकल सायनमेष को देखकर पूर्व दिशा का ज्ञान हो सकता हैं अथवा अग्रहायण पुंज के इल्वक के प्रथम तारे (δ orionis) से जो आजकल प्रायः विषुववृत्त पर है ? इस विषय को बहुत न बढ़ाकर अब संक्षेप में यह बतलाया जायगा कि आजकल के भौतिक ज्योतिष शास्त्र (physical astronomy) के अनुसार अयन चलन या वसंत सम्पात के पीछे खसकने का क्या कारण है, जिससे यह भी सिद्ध हो जायगा कि इसका पूर्ण भगण होता है न कि लोलक की तरह आंदोलन। प्रत्यक्ष वेध से क्या परिणाम निकलता है ? यदि किसी तारे के किसी समय के विषुवांश और क्रांति की तुलना उसी तारे के अन्य समय के विषुवांश और क्रान्ति से की जाय तो देख पड़ता है कि इनमें बहुत १. Memoirs of Archaeological Survey of India No. 18. Hindu Astronomy by G. R. Kaye pp. 23-24.