भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 838 में से

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२४२ सूर्य-सिद्धान्त का कोण प्रायः स्थिर रहता है। इससे यह सिद्ध होता है कि विषुवद्वृत्त इस प्रकार चलता है कि यह क्रान्तिवृत्त को सदैव समान कोण पर काटता है और विषुव सम्पात बिन्दु (वसंत या शरद सम्पात विन्दु) पृथ्वी की गति की विलोम दिशा में भ्रमण कर रहा है । इससे यह सिद्ध होता है कि कदम्ब (क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव) स्थिर है और आकाशीय ध्रुव (विषुवद्वृत्तीय ध्रुव) उसके चारों ओर सदैव समान दूरी पर रहता हुआ परिक्रमा कर रहा है। इसी गति को विषुव सम्पात विन्दु का चलन (Preces- sion of equinoxes) या अयन चलन कहते हैं। यह गति विशेषकर सूर्य और चन्द्रमा के आकर्षण के कारण होती है इसलिए इसको चांद्र-सौर अयन चलन (luni-solar precession) कहते हैं । चांद्र-सौर अयन चलन का कारण ऊपर सिद्ध हो चुका है कि जिस अक्ष पर पृथ्वी २४ घंटे में एक बार घूम जाती है उसकी दिशा में जो परिवर्तन होता है उसीसे विषुव सम्पात विन्दु चल रहा है। पृथ्वी की अक्ष की दिशा में जो विचलन हो रहा है उसका कारण यह है कि पृथ्वी पूर्ण गोल नहीं है वरन् ध्रुवों पर कुछ चपटी और विषुवत् रेखा पर कुछ उभड़ी हुई है इसलिए सूर्य और चन्द्रमा का लब्ध (resultant) आकर्षण इसके केन्द्र से होकर नहीं जाता है। चित्र ५२ में स को सूर्य, क को पृथ्वी का केन्द्र ध धा को पृथ्वी का अक्ष जो आकाश तक बढ़ा दिया गया है, व वा को विषुवत रेखा, अ को वह विन्दु जहां सूर्य का आकर्षण काम कर रहा है तथा अ आ को सूर्य के आकर्षण की दिशा समझो । यदि पृथ्वी पूर्ण गोल होती तो अ और क एक ही विन्दु पर होते जिससे व वा विषुवत् रेखा का तल सूर्य की ओर न झुकता । चित्र से यह भी प्रकट है कि निरक्षदेशीय मेखला का आधा भाग जो वा की ओर है सूर्य के निकट है और दूसरा आधा भाग जो व की ओर है सूर्य से दूर है। इसलिए सूर्य का आकर्षण व भाग की ओर कम होगा जिसका परिणाम यह होता है निरक्षदेशीय तल सूर्य की ओर कुछ झुक जाता है जिससे 'पृथ्वी का अक्ष ध धा कुछ डगमगा जाता है। इससे यह भी जान पड़ता है कि विषुवद्वृत्त का तल झुकते-झुकते क्रान्तिवृत्त के तल से जिस पर सूर्य रहता है अंत में मिल जायगा और पृथ्वी का अक्ष क्रान्तिवृत्त से समकोण बनाने लगेगा तथा ध्रुव और कदम्ब एक हो जायेंगे। परन्तु बात ऐसी नहीं है। क्योंकि पृथ्वी बहुत तीव्र गति से अपने अक्ष पर घूम रही है जिससे विषुवद्वृत्त और क्रान्तिवृत्त के तलों के बीच का कोण सदैव प्रायः एक सा बना रहेगा और ध्रुव कदम्ब के चारों ओर एक वृत्त पर परिक्रमा करता रहेगा। ठीक ऐसी ही बात लट्टू या फिरकी के घूमने में भी होती है। जिस समय

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