भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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२४६ सूर्य-सिद्धान्त परिक्रमा कर लेता है। अयन चलन के कारण जिस प्रकार आकाशीय ध्रुव क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव की परिक्रमा २३°२७' व्यासार्द्ध के वृत्त पर करता है उसी प्रकार राहु की विलोम गति के कारण चन्द्रकक्षा का ध्रुव भी क्रान्तिवृत्तीय ध्रुव की परिक्रमा ५° व्यासार्द्ध के वृत्त पर करता है और इस चन्द्रकक्षा के ध्रुव की परिक्रमा आकाशीय ध्रुव अयन चलन के उस भाग के कारण करता है जो चन्द्रमा के प्रभाव से होता है। इन दोनों कारणों से आकाशीय ध्रुव कभी मध्यम स्थान से कुछ आगे रहता है और कभी पीछे तथा कदम्ब से इसकी दूरी कभी कुछ कम हो जाती है और कभी कुछ अधिक । इसलिए आकाशीय ध्रुव का यथार्थ मार्ग तरंगाकार होता है। इस परिवर्तन का चक्र प्रायः १८ वर्ष का होता है जितने में राहु का एक चक्र होता है। चन्द्रमा के कारण आकाशीय ध्रुव के स्थान में जो यह तनिक सा परिवर्तन होता है उसे अक्षविचलन (nutation) कहते हैं । अक्षविचलन का परिणाम यह होता है कि वसंत सम्पात विन्दु अपने मध्य स्थान से जो सौर चान्द्र, और ग्रह संबंधी अयन चलन से निश्चय किया जाता है कभी आगे रहता है और कभी पीछे। इसके कारण क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच का झुकाव (परमापक्रम) भी अपने मध्यम मान से कभी कुछ कम और कभी कुछ अधिक होता है। अक्षविचलन का आविष्कार ब्रैडली नामक ज्योतिषी ने १७८४ विक्र- मीय से १७९८ विक्रमीय की (१७२७- १७४१ ईस्वी) अवधि में, अजगर के 'ग, तारे (γ.Draconis) के निरंतर वेध से किया था। अक्षविचलन का स्पष्ट ज्ञान चित्र ५४ से होता है।