भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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२४८ सूर्य-सिद्धान्त इष्ट काल में राहु का जो सायन भोगांश होता है अर्थात् विषुव सम्पात बिन्दु से क्रान्तिवृत्त पर राहु जितना दूर होता है वही सायन राहु तथा सूर्य का जो सायन भोगांश होता है वह सायन सूर्य कहा गया है । इस अयन चलन के कारण वसंत संपात बिंदु से प्रत्येक तारे का अंतर सदैव बढ़ रहा है जिससे तारे का सायन भोगांश बढ़ता जाता है। यदि बर्ष के आरंभ का तारे का भोगांश दिया हुआ हो तो किसी अन्य समय का भोगांश इस सूत्र† से जाना जाता है--- ता=त+५०".२६व - १७".२३५ ज्या (सायन राहु) - १".२७ ज्या (२ सायन सूर्य) (५) जहाँ त = वर्ष के आरंभ में तारे का मध्यम सायन भोगांश, व = वर्ष के आरंभ से इष्ट काल का अन्तर ( वर्ष के दशमलव भिन्न में ) इस सूत्र के दाहिने पक्ष का दूसरा पद ५०".२६व मुख्य है क्योंकि व जितना ही बड़ा होता जायगा उतना ही अधिक तारे का भोगांश होगा । तीसरे पद में सायन राहु आया है जो यदि शून्य या १८०° हो तो ज्या सायन राहु शून्य होगा। इस समय तीसरा पद बिल्कुल लुप्त हो जायगा, अर्थात् जब सायन राहु का भोगांश शून्य या १८०° हो तो तीसरा पद उड़ जायगा । और जब सायन राहु ९०° होगा तो तीसरे पद का मान - १७".२३५ तथा जब सायन राहु २७०° होगा तब तीसरे पद का मान + १७".२३५ होगा। इसके कारण राहु के एक भ्रमण काल में वसंत सम्पात विन्दु का स्पष्ट स्थान ९ वर्ष के लगभग मध्यम स्थान से पूर्व और ९ वर्ष के लगभग मध्यम स्थान से पच्छिम रहता है। सूर्य के कारण भी जो तनिक सा अक्ष विचलन होता है वह चौथे पद से सूचित किया गया है। इसका चक्र ६ महीने में बदलता है क्योंकि जिस समय सूर्य का सायन भोगांश शून्य, ९०°, १८०°, २७०° और ३६०° होगा उस समय चौथे पद का मान शून्य होगा और जिस समय सूर्य का भोगांश ४५°, १३५°, २२५°, ३१५° होगा उस समय इसके मान क्रमानुसार-१".२७, +१".२७, -१".२७ और +१".२७ होंगे । इसी प्रकार परमाप क्रम में भी अक्ष विचलन के कारण परिवर्तन होता रहता है। अब इन सूत्रों से अयनांश जानने की रीति का उदाहरण दिया जाता है :- † इस सूत्र का निश्चय ज्योतिषियों के एक सम्मेलन में जो पेरिस में हुआ था सन् १८९६ ई० के मई मास में किया गया था (देखो R. S. Balls' Spherical Astronomy pp. 186.) ।