सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रिप्रश्नाधिकार २४६ समीकरण (१) में वसंत सम्पात की वार्षिक गति का सूत्र दिया हुआ है। परन्तु यह वर्ष सायन है और हमारा वर्ष जो सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार माना जाता है इससे बड़ा है। इसलिये पहले वैराशिक से यह जानना चाहिये कि हमारे एक वर्ष में अयन की गति क्या होती है अर्थात् जब ३६५.२४२२१६ दिन में अयन गति ५०".२५६४+०".०००२२२५ व होती है तब ३६५.२५८७५६५ दिन में क्या होगी। सरल करने पर १६०० ई० की जनवरी के आरम्भ काल में सूत्र का रूप यह होता है। ५०".२५८६७६+.०००२२२५१ व* (६) और १६२२ ई० की जनवरी के आरम्भ काल में वार्षिक अयन गति का सूत्र उपर्युक्त सूत्र में 'व' की जगह २२ रखकर सरल करने से यह आता है— ५०".२६३५७१+.०००२२२५१ वां (७) जनवरी के आरम्भ से मेष संक्रान्ति काल तक प्रायः १०२ दिन या .२७६३ वर्ष होते हैं इसलिए यदि सूत्र (७) में व की जगह .२७६३ रख कर सरल किया जाय तो १६७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में अयन की वार्षिक गति ५०."२६३६३३+.००० २२५१ व (८) होगी जब कि व का मान हमारे सिद्धान्तीय वर्ष के अनुसार लिया जाय । इस सूत्र से यह बात जानी जाती है कि वसंत सम्पात बिन्दु प्रति वर्ष (हमारे सिद्धान्त के अनुसार) क्रान्तिवृत्त के किसी बिन्दु से कितना पीछे हट जाता है। परन्तु हमारा सिद्धान्तीय वर्ष शुद्ध नाक्षत्र सौर वर्ष से .००२३८२०६७ दिन बड़ा है।†† इसलिये इतने समय में हमारे मेष संक्रान्ति का बिन्दु प्रति वर्ष कुछ आगे बढ़ जाता है। इसका परिमाण जानने के लिए मेष संक्रान्ति काल में सूर्य की जो स्पष्ट दैनिक गति होती है उससे उपर्युक्त अन्तर को गुणा करना चाहिये ।
- यदि शुद्ध नाक्षत्र वर्ष लिया जाय जो ३६५.२५६३७४४ दिन का होता है तो एक शुद्ध नाक्षत्र सौर वर्ष में अयन गति ५०."२५८३५१+.०००२२२५१ व होती है। † शुद्ध नाक्षत्र सौर वर्ष के अनुसार १६२२ की जनवरी के आरम्भ में वार्षिक अयन गति ५०".२६३२४६+०".०००२२२५१ व और १६२२ की मेष संक्रान्ति जो १६७६ विक्रमी की मेष संक्रान्ति है इसका रूप ५०".२६३३०८+०".०००२२२५१ व होगा । †† ३६५.२५८७५६४८४ में से ३६५.२५६३७४४१७ घटाने पर यह आता है।