सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० सूर्य-सिद्धान्त १८२२ ई० के 'नाटिकल अलमनक' से मेष संक्रान्ति काल के आगे और पीछे के सूर्य के भोगांशों का अन्तर ५८'४६''.२ होता है। इसलिए इस दिन सूर्य की स्पष्ट दैनिक गति ५८'४६''.२ होती है। इसको उपर्युक्त अन्तर से गुणा करने पर ८''.३६६६ सूर्य की गति होती है। इसलिए यह समझना चाहिये कि हमारे वर्ष के कुछ बड़ा होने के कारण अयनांश में प्रति वर्ष ८''.३६६६ की वृद्धि होती है। इसको सूत्र (८) में सम्मिलित करने से संक्रान्ति काल में वार्षिक अयन गति का सूत्र यह होगा— ५०''.२६३६३३ + .०००२२२५१ व + ८''.३६६६ अथवा ५८''.६६३२३३ + .०००२२२५१ व (६) यदि यह जानना हो कि 'व' वर्ष में अयनांश की वृद्धि क्या होगी तो यह सूत्र काम में लाना होगा— ५८''.६६३२३३ व + .०००२२२५१ { व (व + १) / २ } † अथवा ५८''.६६३२३३ व + .०००१११२५५ व + .०००१११२५५ व² या ५८.६६३३४४२५५ व + .०००१११२५५ व² या संक्षेप में ५८.६६३२४४ व + .०००१११२५५ व² (१०) इससे अयनांश की जो वृद्धि आवे उसमें अक्ष विचलन का संस्कार सूत्र (३) के अनुसार करना चाहिए। अब यह देखना है कि १८७६ वि० कि मेष संक्रान्ति काल में अयनांश कितना था। इसके लिए केवल यह जानना पर्याप्त है कि मेष संक्रान्ति काल में सूर्य का वेध- सिद्ध सायन भोगांश क्या है जिसके जानने का आदेश अगले ११वें तथा १७-१८ श्लोकों में है। इसी अध्याय में आगे यह बतलाया जायगा कि शंकु की छाया नापकर सूर्य का सायन भोग कैसे जाना जा सकता है और उससे अयनांश कैसे जाना जा सकता है। आजकल यह काम दूरदर्शक यंत्रों से बहुत सूक्ष्मतापूर्वक हो सकता ———————————————————————————————————————————— † सूत्र (६) के दूसरे पद में जो व है उसकी जगह क्रमानुसार १, २, ३,···व तक उत्थापन करके सब को जोड़ने से .०००२२२५१ × { व (व + १) / २ } आता है। यह श्रेढी व्यवहार (Arithmetical progression) की संख्याओं के जोड़ने की तरह है।