भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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त्रिप्रश्नाधिकार २५३ भोगांश ३ रा ७°१३'८" है । सायन भोगांश जानने के लिए २२°४१'५" जोड़ दो तो हुआ ३ रा २६°५४' १३" अथवा स्थूल रूप से ३ रा २६°५४' या ११६°५४' । यही राहु का सायन भोगांश हुआ । इसी तरह सूर्य का सायन भोगांश जानना चाहिए । कार्तिक शुक्ल ८ की मध्यरात्रि को सूर्य का निरयन भोगांश १८६°८'१०" होगा इसलिए प्रातः काल ६ बजे इसका निरयन भोगांश १८८°२३' स्थूल रूप से होगा । इसमें २२°४१'५" जोड़ देने पर इसका सायन भोगांश २११°४' स्थूल रूप से हुआ । इसलिए इस दिन सूत्र (३) के अनुसार अक्षविचलन संस्कार = - १७".२३५ ज्या ११६°५४' - १'.२७ ज्या २ x २११°४' = - १७".२३५ ज्या ६०°६' - १".२७ ज्या (३६०° + ६२°८') = - १७".२३५ x .८६६६ - १".२७ x .८८४१ = - १४".६४ - १".१२ = - १६".०६ इसको मध्यम अयनांश २२°४१'५".४१ में जोड़ा तो कार्तिक शुक्ल ८ के प्रातःकाल स्पष्ट अयनांश हुआ २२°४०'४६".३५ । केतकर जी ने अपने ज्योतिर्गणित में अयनांश जानने की जो सारिणी दी है उससे उपर्युक्त अयनांश ६' या ७' कम आता है। इसका पहला कारण यह है कि केतकर जी ने मेष संक्रान्ति का आरम्भ उस समय माना है जिस समय चित्रा नामक तारा सूर्य से १८०° पर रहता है जब कि आजकल सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार मेष संक्रमण कोई ७ घड़ी पहले ही हो जाता है। दूसरा कारण यह है कि केतकर जी ने शुद्ध नाक्षत्र वर्ष का प्रयोग किया है और इस भाष्य में सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार वर्ष मानकर गणना की गयी है । वेध करके अयनांश की परीक्षा करना स्फुटदृक्तुल्यतां गच्छेदयने विषुवद्वये । प्राक्चक्रं चलितं हीने छायार्कात्करणागते ॥११॥ अन्तरांशैरथोंद्धृत्य पश्चाच्छ्लेषेस्तथाऽधिके । अनुवाद—(११) उत्तरायण और दक्षिणायन के दिन अथवा विषुव संक्रान्ति के दिन यह बात सहज ही देखी जा सकती है कि नक्षत्र किधर चला है। यदि छाया- सिद्ध सूर्य के भोगांश से (जिसकी रीति आगे १७-१८ श्लोकों में बतलायी गयी है) गणित सिद्ध सूर्य का भोगांश कम हो तो समझना चाहिए कि जितना इन दोनों का अन्तर है उतना ही नक्षत्र चक्र अथवा अश्विनी का आदि विन्दु पूर्व को चला है