सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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इसलिए १९७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में सूर्य का अयनांश = २२° ६′ १७″.७ - ८′ ३६″.६ = २२° ३७′ ३८″.१ बस इसी में सूत्र (१०) के अनुसार जो कुछ वृद्धि आवे उसको जोड़ देने से किसी अन्य मेष संक्रान्ति काल का मध्यम अयनांश प्राप्त होगा । यदि अक्ष विचलन का संस्कार सूत्र (३) की सहायता से कर दिया जाय तो संक्रान्ति काल का स्पष्ट अयनांश प्राप्त हो जायगा । यदि संक्रान्ति काल के सिवा किसी अन्य समय का अयनांश जानना हो तो संक्रान्ति से जितने दिन बीते हों उतने दिन की अयन गति (जब कि एक वर्ष में ५८″.६६* के लगभग अयन की गति होती है) मेष संक्रान्ति के मध्यम अयनांश में जोड़कर अक्षविचलन का संस्कार कर दे तो उस समय का स्पष्ट अयनांश ज्ञात हो जायगा । उदाहरण—काशी में १९८२ वि० की कार्तिक शुक्ल ८ रविवार का अयनांश क्या होगा ? १९७६ से १९८२ तक तीन वर्ष होते हैं इसलिए तीन वर्ष में अयनांश की वृद्धि जानने के लिए सूत्र (१०) में ‘व’ की जगह ३ लिखकर सरल करो, ५८″.६६३३४४ x ३ + .०००१११२५५ x ३² = १७५″.६६००३२ + ०″.००१००१२६५ = १७५″.६६१ = २′ ५५″.६६ इसको २२° ३७′ ३८″.१ में जोड़ा तो २२° ४०′ ३४″.०६ मेष संक्रान्ति काल का मध्यम अयनांश हुआ । १९८२ वि० की मेष संक्रान्ति वैशाख कृष्ण ५ सोमवार को काशी के मध्यम ६ बजे के उपरांत ६ घड़ी ३४ पल ३६ विपल पर लगी । वैशाख कृष्ण ५ से कार्तिक शुक्ल ८ तक १६५ सावन दिन होते हैं जो .५३३६ सौर वर्ष के समान हुआ । इतने समय में ५८″.६६ प्रति वर्ष के हिसाब से मध्यम अयनांश ५८″.६६ x .५३३६ = ३१″.३२ और बढ़ेगा । इसलिए कार्तिक शुक्ल ८ को मध्यम अयनांश २२° ४१′ ५″.४१ होगा । अक्ष विचलन संस्कार के लिए कार्तिक शुक्ल ८ के दिन सायन राहु और सायन सूर्य का भोगांश जानना आवश्यक है । इस दिन प्रातः काल राहु का निरयन
- अधिक शुद्ध जानना हो तो सूत्र (६) से उस वर्ष की अयन गति निश्चय करना चाहिए ।