सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
२५२ | सूर्य-सिद्धान्त
इसलिए १९७६ वि० की मेष संक्रान्ति काल में सूर्य का अयनांश = २२° ६′ १७″.७ - ८′ ३६″.६ = २२° ३७′ ३८″.१ बस इसी में सूत्र (१०) के अनुसार जो कुछ वृद्धि आवे उसको जोड़ देने से किसी अन्य मेष संक्रान्ति काल का मध्यम अयनांश प्राप्त होगा । यदि अक्ष विचलन का संस्कार सूत्र (३) की सहायता से कर दिया जाय तो संक्रान्ति काल का स्पष्ट अयनांश प्राप्त हो जायगा । यदि संक्रान्ति काल के सिवा किसी अन्य समय का अयनांश जानना हो तो संक्रान्ति से जितने दिन बीते हों उतने दिन की अयन गति (जब कि एक वर्ष में ५८″.६६* के लगभग अयन की गति होती है) मेष संक्रान्ति के मध्यम अयनांश में जोड़कर अक्षविचलन का संस्कार कर दे तो उस समय का स्पष्ट अयनांश ज्ञात हो जायगा । उदाहरण—काशी में १९८२ वि० की कार्तिक शुक्ल ८ रविवार का अयनांश क्या होगा ? १९७६ से १९८२ तक तीन वर्ष होते हैं इसलिए तीन वर्ष में अयनांश की वृद्धि जानने के लिए सूत्र (१०) में ‘व’ की जगह ३ लिखकर सरल करो, ५८″.६६३३४४ x ३ + .०००१११२५५ x ३² = १७५″.६६००३२ + ०″.००१००१२६५ = १७५″.६६१ = २′ ५५″.६६ इसको २२° ३७′ ३८″.१ में जोड़ा तो २२° ४०′ ३४″.०६ मेष संक्रान्ति काल का मध्यम अयनांश हुआ । १९८२ वि० की मेष संक्रान्ति वैशाख कृष्ण ५ सोमवार को काशी के मध्यम ६ बजे के उपरांत ६ घड़ी ३४ पल ३६ विपल पर लगी । वैशाख कृष्ण ५ से कार्तिक शुक्ल ८ तक १६५ सावन दिन होते हैं जो .५३३६ सौर वर्ष के समान हुआ । इतने समय में ५८″.६६ प्रति वर्ष के हिसाब से मध्यम अयनांश ५८″.६६ x .५३३६ = ३१″.३२ और बढ़ेगा । इसलिए कार्तिक शुक्ल ८ को मध्यम अयनांश २२° ४१′ ५″.४१ होगा । अक्ष विचलन संस्कार के लिए कार्तिक शुक्ल ८ के दिन सायन राहु और सायन सूर्य का भोगांश जानना आवश्यक है । इस दिन प्रातः काल राहु का निरयन
- अधिक शुद्ध जानना हो तो सूत्र (६) से उस वर्ष की अयन गति निश्चय करना चाहिए ।
त्रिप्रश्नाधिकार २५३ भोगांश ३ रा ७°१३'८" है । सायन भोगांश जानने के लिए २२°४१'५" जोड़ दो तो हुआ ३ रा २६°५४' १३" अथवा स्थूल रूप से ३ रा २६°५४' या ११६°५४' । यही राहु का सायन भोगांश हुआ । इसी तरह सूर्य का सायन भोगांश जानना चाहिए । कार्तिक शुक्ल ८ की मध्यरात्रि को सूर्य का निरयन भोगांश १८६°८'१०" होगा इसलिए प्रातः काल ६ बजे इसका निरयन भोगांश १८८°२३' स्थूल रूप से होगा । इसमें २२°४१'५" जोड़ देने पर इसका सायन भोगांश २११°४' स्थूल रूप से हुआ । इसलिए इस दिन सूत्र (३) के अनुसार अक्षविचलन संस्कार = - १७".२३५ ज्या ११६°५४' - १'.२७ ज्या २ x २११°४' = - १७".२३५ ज्या ६०°६' - १".२७ ज्या (३६०° + ६२°८') = - १७".२३५ x .८६६६ - १".२७ x .८८४१ = - १४".६४ - १".१२ = - १६".०६ इसको मध्यम अयनांश २२°४१'५".४१ में जोड़ा तो कार्तिक शुक्ल ८ के प्रातःकाल स्पष्ट अयनांश हुआ २२°४०'४६".३५ । केतकर जी ने अपने ज्योतिर्गणित में अयनांश जानने की जो सारिणी दी है उससे उपर्युक्त अयनांश ६' या ७' कम आता है। इसका पहला कारण यह है कि केतकर जी ने मेष संक्रान्ति का आरम्भ उस समय माना है जिस समय चित्रा नामक तारा सूर्य से १८०° पर रहता है जब कि आजकल सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार मेष संक्रमण कोई ७ घड़ी पहले ही हो जाता है। दूसरा कारण यह है कि केतकर जी ने शुद्ध नाक्षत्र वर्ष का प्रयोग किया है और इस भाष्य में सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार वर्ष मानकर गणना की गयी है । वेध करके अयनांश की परीक्षा करना स्फुटदृक्तुल्यतां गच्छेदयने विषुवद्वये । प्राक्चक्रं चलितं हीने छायार्कात्करणागते ॥११॥ अन्तरांशैरथोंद्धृत्य पश्चाच्छ्लेषेस्तथाऽधिके । अनुवाद—(११) उत्तरायण और दक्षिणायन के दिन अथवा विषुव संक्रान्ति के दिन यह बात सहज ही देखी जा सकती है कि नक्षत्र किधर चला है। यदि छाया- सिद्ध सूर्य के भोगांश से (जिसकी रीति आगे १७-१८ श्लोकों में बतलायी गयी है) गणित सिद्ध सूर्य का भोगांश कम हो तो समझना चाहिए कि जितना इन दोनों का अन्तर है उतना ही नक्षत्र चक्र अथवा अश्विनी का आदि विन्दु पूर्व को चला है
२५४ सूर्य-सिद्धान्त अर्थात् वसंत सम्पात विन्दु से पूर्व है। परन्तु यदि अधिक हो तो उतना ही नक्षत्र- चक्र पच्छिम चला हुआ समझना चाहिए। विज्ञान भाष्य—छाया से सूर्य का जो भोगांश आता है वह वसंत सम्पात विन्दु से सूर्य का भोगांश (सायन भोगांश) है और गणित से जो भोगांश आता है जिसकी रीति स्पष्टाधिकार में बतलायी गयी है वह अश्विनी के आदि विन्दु से होता है। इसलिए इन दोनों का अन्तर यथार्थ अयनांश हुआ। इससे सिद्ध होता है कि अयनांश की परीक्षा वेध से भी करनी चाहिए। सूर्य-सिद्धान्तकार का मत है कि अश्विनी का आदि विन्दु जो क्रान्तिवृत्त का भी आदि विन्दु समझा जाता है वसंत सम्पात विन्दु से २७° पूर्व या २७° पच्छिम तक जा सकता है। इससे अधिक नहीं। ऐसा ही मत और भी कई प्राचीन आचार्यों का है। परन्तु कुछ आचार्य इससे भिन्न मत भी रखते हैं जिसकी चर्चा पहले की गयी है। प्राचीन वाक्यों से* भी यह सिद्ध होता है कि वसंत सम्पात विन्दु आजकल के अश्विनी के आदि विन्दु से २७° से भी अधिक पूर्व रहा है। भौतिक ज्योतिर्विज्ञान से जो कुछ सिद्ध होता है वह ऊपर बतलाया ही जा चुका है। परन्तु इसकी सत्यता का प्रत्यक्ष प्रमाण तो तब मिलेगा जब वसंत संपात विन्दु वास्तव में अश्विनी के आदि विन्दु से २७° से भी अधिक पच्छिम हो जायगा। सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार कलियुग संवत ५४०० में अथवा विक्रम संवत २३५६ में आज से ३७४ वर्ष उपरांत २७° का अयनांश पूरा होगा। परन्तु वेध से इसका प्रमाण इससे पहले ही मिल जायगा क्योंकि वि० १६८२ की मेष संक्रांति काल में मध्यम अयनांश २२°४०' ३४''.०६ होगा जो २७° से केवल ४°१६'२६'' के लगभग कम है। सूत्र (१०) को इसके समान करके समीकरण बनाकर 'व' का मान निकाल लेने से उतने वर्ष की संख्या निकल आवेगी जितने वर्ष में अयनांश की इतनी वृद्धि होगी। अब ४°१६'२६" = ५८".६६३३४४व × ०".०००१११२५५व² या १५५६६" = ५८".६६३३४४व × ०".०००१११२५५व² या .०००१११२५५व² + ५८.६६३३४४व - १५५६६ = ० ∴ व = - ५८.६६३३४४ ± √(५८.६६३३४४)² + ४ × ───────────────────────────── २ × .०००१११२५५ .०००१११२५५ × १५५६६ = २६६ वर्ष के लगभग *देखो पिछले श्लोक के विज्ञान भाष्य में शतपथ ब्राह्मण का उद्धरण तथा तत्संबंधी गणना।
त्रिप्रश्नाधिकार २५५ इसलिए प्रकट है कि १६८२+२६६=२२४८ विक्रमीय के दो चार वर्ष उपरांत ही यह सिद्ध हो जायगा कि वसंत संपात का पूर्ण भगण होता है अथवा आंदोलन । यदि यह बात प्रत्यक्ष हो गयी कि वसंत सम्पात विन्दु पूर्ण भगण के कारण पीछे खसकता ही जायगा तो भारतीय पंचांग-निर्माण की रीति तथा तिथियों और पर्वों के निश्चय करने के लिए संशोधन की अत्यन्त आवश्यकता पड़ेगी । फलित ज्योतिष के लिए योगों और मुहूर्तों के निश्चय करने के जितने नियम हैं उनमें भी महान् परिवर्तन करना होगा । पलभा जानने की १ली रीति एवं विषुवति छाया स्वदेशे या दिनार्धजा । दक्षिणोत्तरयोरेव सा तत्र विषुवत्प्रभा ॥१२॥ अनुवाद--(१२) इस प्रकार सूर्य जिस दिन विषुवद् वृत्त पर हो उस दिन मध्याह्न काल में जिस स्थान की उत्तर दक्षिण रेखा पर १२ अंगुल शंकु की जितनी लम्बी छाया पड़े वही उस स्थान की विषुवत्प्रभा या पलभा होती है । विज्ञान भाष्य—पलभा के सम्बन्ध में २०४-२०५ पृष्ठों पर तथा इसी अध्याय के सातवें श्लोक के भाष्य में बहुत कुछ लिखा जा चुका है । २०५वें पृष्ठ में यह बतलाया गया है कि किसी स्थान के अक्षांश की स्पर्शरेखा उस स्थान की पलभा को शंकु से भाग देने पर आती है । इसलिए यहाँ यह बतला देना आवश्यक है कि इस श्लोक के अनुसार पलभा का जो मान जाना जाता है वह स्थूल है । क्योंकि सायन मेष या सायन तुला संक्रान्ति (विषुव संक्रान्ति) के दिन, जिस दिन मध्याह्न काल में शंकु की छाया नाप कर पलभा जानी जाती है मध्याह्न काल में सूर्य ठीक विषुवद् वृत्त पर नहीं होता वरन् कुछ आगे या पीछे होता है । मध्याह्न काल में ठीक विषुवद् वृत्त पर सूर्य के आने का संयोग कई वर्ष के बाद आता है । इस दिन सूर्य की क्रान्ति प्रत्येक घंटे में प्रायः एक कला के हिसाब से बदलती है । इसलिए सायन मेष या तुला संक्रान्ति शुद्ध काल गणना से जानकर सूर्य की मध्याह्न काल की क्रान्ति जान लेनी चाहिये और इसका संस्कार कर लेने के बाद शुद्ध पलभा जाननी चाहिये । संस्कार करने की रीति अगले १४-१५ श्लोकों में बतलायी जायगी । अक्षांश जानने की १ली रीति शंकुश्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते । लम्बाक्षज्ये तयोश्चापे लम्बाक्षौ दक्षिणौ सदा ॥१३॥
२५६ सूर्य-सिद्धान्त अनुवाद—(१३) शंकु और उसकी छाया (यहाँ पलभा) को अलग-अलग त्रिज्या अर्थात् ३४३८ से गुणा करके प्रत्येक गुणनफल को विषुवत्कर्ण से भाग दे देने पर क्रम से लम्बज्या और अक्षज्या आ जायेंगी जिनके धनु क्रम से लम्बांश और अक्षांश होंगे । (उत्तर गोल में) ये सदा दक्षिण होते हैं । विज्ञान भाष्य—इस श्लोक का सार यह है :— शंकु × त्रिज्या लम्बज्या = ─────────── विषुवत्कर्ण पलभा × त्रिज्या अक्षज्या = ─────────── विषुवत्कर्ण सायन मेष या तुला संक्रान्ति के दिन मध्यान्ह काल में १२ अंगुल शंकु का जो छायाकर्ण होता है वही विषुवत्कर्ण, पलकर्ण या अक्षकर्ण कहलाता है । पृष्ठ २०४ के चित्र ४१ में क ग विषुवत्कर्ण है । इसलिए विषुवत्कर्ण = √(पलभा² + शंकु²) पृष्ठ ५५ के चित्र ७ और पृष्ठ ५६ के चित्र १० में यह बतलाया गया है कि किसी स्थान के अक्षांश और लम्बांश क्या हैं । इन चित्रों से यह भी प्रकट होता है कि किसी स्थान के अक्षांश और लम्बांश दोनों मिलकर ९०° के समान होते हैं । पृष्ठ २०४ में चित्र ४१ के सम्बन्ध में यह भी कहा गया है कि विषुवत्कर्ण और शंकु के बीच का कोण ख क ग अक्षांश है । इसलिए यह सिद्ध है कि विषुवत्कर्ण और पलभा के बीच का कोण क ग ख लम्बांश हुआ, क्योंकि < ख क ग और < क ग ख दोनों पूरक कोण हैं । इसलिए लम्बज्या या लम्बांश की ज्या क ख शंकु = ─── = ────────── आजकल की प्रथानुसार (दशमलव भिन्न में) क ग विषुवत्कर्ण शंकु × त्रिज्या = ─────────── हमारे सिद्धान्तों के अनुसार (कलाओं में) विषुवत्कर्ण लम्बांश की ज्या को अक्षांश की कोटिज्या भी कहते हैं क्योंकि लम्बांश और अक्षांश का योग ९०° होता है । इसी तरह अक्षज्या या अक्षांश की ज्या ख ग पलभा = ─── = ────────── (दशमलव भिन्न में) क ग विषुवत्कर्ण अथवा पलभा × त्रिज्या ──────────── (कलाओं में) विषुवत्कर्ण
त्रिप्रश्नाधिकार २५७ ४२-४३ चित्रों के सम्बन्ध में भी बतलाया गया है कि क्षितिज के उत्तर- बिन्दु से ध्रुव की ऊँचाई अक्षांश के समान होती है। इससे पाठकों को शायद शंका हो कि अक्षांश की कौन परिभाषा ठीक है। इसलिए यहां इस बात का निश्चय कर देना चाहिये कि अक्षांश की यह तीनों परिभाषाएँ एक ही हैं। चित्र ७ और १० से स्पष्ट है कि विषुवत् रेखा से किसी स्थान का जो कोणात्मक अंतर उत्तर-दक्खिन रेखा पर होता है वही उस स्थान का अक्षांश है और ध्रुव से उत्तर-दक्खिन रेखा पर स्थान का कोणात्मक अंतर उसका लम्बांश है। विषुवत् रेखा के तल को यदि आकाश की ओर बढ़ा दिया जाय तो यही विषुवन्मण्डल कहलाता है और उत्तर-दक्खिन रेखा के तल को आकाश में बढ़ा दिया जाय तो वह यामोत्तर वृत्त कहलाता है। इसी तरह पृथ्वी के केन्द्र से किसी स्थान को मिलाने वाली रेखा (चित्र ७ की रेखा स भ) ऊपर बढ़ाने पर आकाश के जिस बिन्दु पर पहुँचती है वह उस स्थान का खस्वस्तिक कहलाता है। इसलिए यह सिद्ध है कि किसी स्थान के खस्वस्तिक से विषुवन्मण्डल का जो अंतर यामोत्तर वृत्त पर होता है वह भी अक्षांश है तथा खस्वस्ति से आकाशीय ध्रुव का जो अन्तर यामोत्तरवृत्त पर होता है वह लम्बांश है। इसलिए चित्र ४२, ४३ के ख वि धनु श स्थान के अक्षांश तथा ख ध धनु श स्थान के लम्बांश हुए। परन्तु ध वि धनु या उ ख धनु ६० अंश के समान है। इसलिए प्रत्येक से सामान्य धनु ध ख निकाल दिया जाय तो शेष ख वि और उ ध समान होंगे, अर्थात् खस्वस्तिक से विषुवन्मण्डल का जो अंतर होता है वही क्षितिज के उत्तर बिन्दु से उत्तरी आकाशीय ध्रुव का अन्तर होता है। इसी तरह यह भी सिद्ध हो सकता है कि ध ख धनु द वि धनु के समान है, अर्थात् क्षितिज के दक्षिण बिन्दु से विषुवन्मण्डल की जो ऊंचाई होती है वह भी लम्बांश के समान है। यह भी स्पष्ट है कि उत्तर गोल में किसी स्थान के खस्वस्तिक से विषुवन्मण्डल सदैव दक्षिण रहता है इसलिए ख वि अक्षांश और वि द लम्बांश उत्तर गोल में सदा दक्षिण ही रहेंगे। अब यह सिद्ध करना रह गया कि शंकु और विषुवतकर्ण के बीच का अन्तर अक्षांश के समान क्यों है। यह ध्यान रखना चाहिए कि चित्र ५५ में पृथ्वी की तुलना में शंकु बहुत बड़ा दिखलाया गया है। रेखागणित से यह स्पष्ट है कि < स श छ = < र श ख = < श र भ + < र भ श
२५८ सूर्य-सिद्धान्त
चित्र ५५ उ स व द = भूतल की उत्तर-दक्षिण रेखा उ = उत्तरी ध्रुव द = दक्षिणी ध्रुव स = वह स्थान जहाँ श स शंकु गड़ा है व = विषुवत्रेखा का बिन्दु ख = स स्थान का खस्वस्तिक र = विषुवद्वृत्त पर रवि का स्थान स छ = पलभा श छ = विषुवत्कर्ण भ = पृथ्वी का केन्द्र
त्रिप्रश्नाधिकार २५६ परंतु भूकेन्द्र से सूर्य का अन्तर भर प्रायः ६ करोड़ २६ लाख मील है और पृथ्वी का अर्द्धव्यास भ स अथवा भ श (क्योंकि स श = १२ अंगुल) ४००० मील है। इसलिए ∠श र भ इतना छोटा कोण है कि यह शून्य माना जा सकता है (यथार्थ में यह कोण ६ विकला के लगभग होता है) । इसलिए < स श छ = < र भ श = < व भ स = अक्षांश अर्थात् शंकु और विषुवत्कर्ण के बीच का कोण अक्षांश के समान होता है। इसलिए पलभा और विषुवत्कर्ण के बीच का कोण जो पहले का पूरक कोण होता है लम्बांश के समान हुआ। उदाहरण—प्रयाग की पलभा ५ अंगुल ४१ व्यंगुल अथवा ५.६८ अंगुल है तो प्रयाग का अक्षांश बतलाओ । प्रयाग का विषुवत्कर्ण = √शंकु² + पलभा² = √१२² + (५.६८)² = √१४४ + ३२.२६ = √१७६.२६ = १३.२८ अंगुल ∵ प्रयाग की अक्षज्या पलभा × त्रिज्या = ———————— विषुवत्कर्ण ५.६८ × ३४३८ = ———————— १३.२८ = १४७०.५ कला इसलिए ज्याओं की सारिणी (पृष्ठ १२०-१२१) तथा स्पष्टाधिकार के श्लोक ३३ (पृष्ठ १३०) के अनुसार अक्षांश = २५°२१′ अक्षांश जानने की दूसरी रीति— मध्यच्छाया भुजस्तेन गुणिता त्रिभमौर्विका । तत्कर्णाप्तधनुर्लिप्ता नतास्ता दक्षिणे भुजे ॥१४॥ उत्तराश्चोत्तरे याम्यास्तत्सूर्यक्रान्तिलिप्तिका । दिग्भेदे मिश्रितास्साम्ये विश्लिष्टाश्चाक्षलिप्तिकाः ॥१५॥
२६० सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद—(१४) किसी दिन के मध्याह्न की छाया को जिसे भुज भी कहते हैं त्रिज्या से गुणा करके मध्याह्न के छाया कर्ण से भाग दे दो और भागफल का धनु बनाओ तो सूर्य का मध्याह्नकालिक नतांश ज्ञात हो जायगा । यदि छाया दक्षिण की ओर हो तो (१५) उत्तर नतांश होगा और यदि छाया उत्तर हो तो दक्षिण नतांश होगा । यदि नतांश और सूर्य की क्रान्ति की दिशाएं भिन्न हों तो इन दोनों का योग- फल और एक ही हों तो अन्तर अक्षांश होगा । विज्ञान भाष्य—खस्वस्तिक से आकाश के किसी विन्दु (तारा, सूर्य का केन्द्र इत्यादि) पर जाता हुआ जो वृत्त क्षितिज से समकोण पर खींचा जाता है उसे ऊर्ध्ववृत्त (Vertical Circle) कहते हैं । इस वृत्त पर उस विन्दु का खस्वस्तिक से जो अंतर होता है उसे उस विन्दु का नतांश (zenith distance) कहते हैं और क्षितिज से जो अन्तर होता है उसे उस विन्दु का उन्नतांश (altitude) कहते हैं । सममण्डल भी एक ऊर्ध्ववृत्त है । पर इसमें विशेषता यह है कि यह क्षितिज के पूर्व पश्चिम विन्दुओं पर होता है । यामोत्तर वृत्त भी उत्तर दक्षिण बिन्दुओं पर ऊर्ध्ववृत्त है । इसलिए मध्याह्न काल में जब कि सूर्य यामोत्तर वृत्त पर रहता है, इससे खस्वस्तिक का जो अंतर होता है वह इसका मध्याह्नकालिक नतांश हुआ । यदि सूर्य विषुवद्वृत्त पर भी हो तो यही अक्षांश के समान होगा । यदि सूर्य विषुवद्वृत्त पर न हो तो यह या तो विषुवद्वृत्त से उत्तर रहेगा या दक्षिण । मध्याह्न काल में सूर्य का विषुवद्वृत्त से जो अंतर होता है वही सूर्य की क्रान्ति है जो सूर्य के विषुवद्वृत्त से उत्तर या दक्षिण रहने के अनुसार उत्तर या दक्षिण क्रान्ति कहलाती है । इसी प्रकार सूर्य खस्वस्तिक से भी उत्तर या दक्षिण हो सकता है। यदि सूर्य खस्वस्तिक से उत्तर हो तो छाया दखिन की ओर होगी और खस्वस्तिक से सूर्य का अंतर उत्तर नतांश कहलायेगा । परन्तु यदि सूर्य खस्व- स्तिक से दखिन हो तो छाया उत्तर की ओर होगी और सूर्य का नतांश दक्षिण होगा । चित्र ५६ से यह स्पष्ट है कि सूर्य के मध्याह्नकालिक नतांश और क्रान्ति से अक्षांश कैसे जाना जा सकता है :— उ ध ख व द यामोत्तर वृत्त, ध उत्तरी आकाशीय ध्रुव, ख खस्वस्तिक, व विषुवद्वृत्त ओर यामोत्तर वृत्त का सामान्य विन्दु, और र, रा, री सूर्य के तीन भिन्न-भिन्न स्थान हैं । र पर सूर्य विषुवद्वृत्त के दखिन है इसलिए इस समय सूर्य की दक्षिण क्रान्ति व र है परन्तु व रा या व री सूर्य की उत्तर क्रान्तियां हैं। इसी प्रकार ख र और ख रा सूर्य के दक्षिण नतांश और ख री उत्तर नतांश हैं। ख व स स्थान का अक्षांश है । चित्र से प्रकट है कि
त्रिप्रश्नाधिकार २६१ चित्र ५६ व ख = ख र - व र (१) = ख रा + व रा (२) = व री - ख री (३) समीकरण (१) में सूर्य के नतांश और क्रान्ति दोनों दक्षिण तथा समीकरण (३) में नतांश और क्रान्ति दोनों उत्तर हैं । परन्तु समीकरण (२) में नतांश दक्षिण और क्रान्ति उत्तर हैं । इससे प्रकट है कि जब नतांश और क्रान्ति दोनों की दिशाएँ एक ही हों तो इनका अंतर और भिन्न हों तो योग करने से अक्षांश जाना जा सकता है । यदि न नतांश, क क्रान्ति और अ अक्षांश माने जायं तो इनका सम्बन्ध इस समीकरण से प्रकट होगा— न ± क = अ यहां धन का चिह्न उस समय लिखा जायगा जब न और क दोनों की दिशाएँ भिन्न हैं और ऋण का चिह्न उस समय जब दोनों की दिशाएँ एक ही हों । ऊपर के दोनों श्लोकों में यह बतलाया गया है कि शंकु की मध्याह्नकालीन छाया नापकर नतांश कैसे जानते हैं । यह तो स्पष्ट ही है कि शंकु और छायाकर्ण के बीच में जो कोण होता है वह सूर्य का नतांश है । इसलिए
२६२ सूर्य-सिद्धान्त नतांश ज्या = (छाया × त्रिज्या) / छायाकर्ण [ सिद्धान्तीय रीति के अनुसार ] नतांश की ज्या से नतांश निकाल कर इसको सूर्य की क्रान्ति में जो स्पष्टा- धिकार के श्लोक २८ के अनुसार जानी जा सकती है, जोड़ने या घटाने से, जैसी आवश्यकता हो, अक्षांश निकल आता है। उदाहरण—यदि किसी दिन सूर्य की उत्तर क्रान्ति १५.२५ और इसी दिन प्रयाग में शंकु की मध्याह्न छाया २.१२ अंगुल हो तो प्रयाग का अक्षांश बतलाओ । प्रयाग का मध्याह्न छायाकर्ण = √(शंकु² + छाया²) = √(१२² + (२.१२)²) = √१४८.४६ = १२.१६ अंगुल ∵ नतांश ज्या = (छाया × त्रिज्या) / छायाकर्ण = (२.१२ × ३४३८) / १२.१६ = ५६८' इसलिए नतांश = ६° ५१' यह नतांश दखिन की ओर है और सूर्य की क्रान्ति उत्तर है । इसलिए दोनों का योग प्रयाग का अक्षांश होगा । इसलिए इस रीति से प्रयाग का अक्षांश = ६° ५१' + १५° २५' = २५° १६' दोनों रीतियों से निकाले गये अक्षांशों में कुछ अन्तर है । इसका कारण प्रत्यक्ष है । छाया की नाप स्थूल होती है जिसका कारण पहले बतलाया जा चुका है। यदि छाया छोटी हो तो अशुद्धि और भी बढ़ जाती है । पलभा जानने की दूसरी रीति यदि अक्षांश ज्ञात हो— तज्ज्याऽक्षज्याऽथ तद्वर्गं प्रोज्झ्य त्रिज्याकृतेः पदम् । लम्बज्याऽक्षगुणोऽर्कघ्नः पलभाप्तोऽवलम्बकः ॥१६॥ अनुवाद—(१६) ऊपर बतलायी गयी रीति से अक्षांश जानकर अक्षज्या बनाओ और अक्षज्या के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से घटाकर शेष का वर्गमूल निकालो
त्रिप्रश्नाधिकार २६३ तो लम्बज्या निकल आवेगी । अक्ष ज्या को १२ से गुणा करके लम्बज्या से भाग देने पर जो आवेगा वही पलभा होगी । विज्ञान भाष्य—पलभा जानने की पहली रीति सायन मेष या तुला संक्रान्ति के दिन ही काम में लायी जाती है । दूसरी रीति से किसी दिन के मध्याह्न काल के सूर्य की क्रान्ति और नतांश से अक्षांश जानकर पलभा की गणना की जा सकती है । इस श्लोक का सार यह है :— √ त्रिज्या² – अक्षज्या² = लम्बज्या और अक्षज्या × १२ / लम्बज्या = पलभा उपपत्ति—चित्र १० पृष्ठ ५६ में सभा लम्बज्या, प्रभा अक्षज्या, सभ त्रिज्या और कोण सभाभ समकोण है, इसलिए यदि अक्ष ज्या ज्ञात हो तो, सभा² = सभ² – प्रभा² अथवा सभा = √ सभ² – प्रभा² ∵ लम्बज्या = √ त्रिज्या² – अक्षज्या² चित्र ४१ पृष्ठ २०४ में ख ग पलभा, क ख शंकु, ∠ख क ग अक्षांश और ∠क ग ख लम्बांश है, इसलिए आजकल की रीति के अनुसार अक्षज्या = ख ग / क ग लम्बज्या = क ख / क ग ∴ अक्षज्या / लम्बज्या = (ख ग / क ग) ÷ (क ख / क ग) = ख ग / क ख . = पलभा / शंकु = पलभा / १२ अंगुल ∴ पलभा = (अक्षज्या × १२ / लम्बज्या) अंगुल (१)
२६४ सूर्य-सिद्धान्त इस रीति से पलभा का मान निकालने में बहुत गुणा भाग करना पड़ता है । इसलिए यदि स्पर्शरेखाओं की सारिणी बना ली जाय तो यह काम सहज ही हो सकता है क्योंकि अक्षांश और लम्बांश पूरक कोण हैं इसलिए अक्ष ज्या / लम्ब ज्या = अक्षांश स्पर्शरेखा, पलभा = १२ × अक्षांश स्पर्शरेखा (२) यही बात पृष्ठ २०५ में भी दिखलायी गयी है । उदाहरण—प्रयाग का अक्षांश २५° २५' है तो प्रयाग की पलभा क्या होगी ? (१) सूर्य-सिद्धान्त की रीति से अक्षज्या = २५° २५' की ज्या = १४७४' ∴ लम्बज्या = √ त्रिज्या२ - अक्षज्या२ = √ ३४३८२ - १४७४२ = √ (३४३८ + १४७४) (३४३८ - १४७४) = √ ४९१२ × १६६४ = ३१०६' पलभा = (अक्षज्या × १२) / लम्बज्या = (१४७४ × १२) / ३१०६ = ५.६६ अंगुल (२) नवीन रीति से— पलभा = १२ × अक्षांश स्पर्शरेखा = १२ × स्परे* २५° २५' = १२ × ०.४७५२ अंगुल = ५.७०२४ अंगुल = ५.७ अंगुल
- स्पर्शरेखा की जगह सरलता के लिए स्परे लिखा गया है जैसे कोटिज्या के लिए कोज्या लिखा जाता है ।
त्रिप्रश्नाधिकार २६५ सूर्य की क्रान्ति नाप कर सायन भोगांश जानना- स्वाक्षार्कनतभागानां दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा । दिग्भेदेऽपक्रमश्शेषः तस्य ज्या त्रिज्यया हता ।।१७।। परमापक्रमज्याप्तच्चापं मेषादिगे रविः । कर्यादौ प्रोञ्झ्य चक्रार्धात्तुलादौ भार्धसंयुतात् ।।१८।। मृगादौ प्रोञ्झ्य भगणात् मध्याह्नार्कस्फुटो भवेत् । तन्मान्दमसकृद्धामं फलं मध्यो दिवाकरः ।।१९।। अनुवाद—(१७) अपने स्थान का अक्षांश और मध्यान्हकालिक सूर्य का नतांश यदि एक ही दिशा के हों तो इनका अन्तर निकाले और भिन्न-भिन्न दिशा के हों तो जोड़ दे । जो कुछ आवे वही सूर्य की मध्यान्हकालिक क्रान्ति है । इसकी ज्या को त्रिज्या से गुणा करके (१८) सूर्य की परमक्रान्ति ज्या से भाग दे दे और लब्धि का धनु बनावे । यदि सूर्य सायन मेषादि तीन राशियों में हो तो यही (धनु) मध्यान्ह- कालिक सूर्य का स्फुट सायन भोगांश होगा । यदि सूर्य सायन कर्कादि तीन राशियों में हो तो इस धनु को ६ राशि में घटाने से जो कुछ आवेगा वह मध्यान्हकालिक सूर्य का स्फुट सायन भोगांश होगा । यदि सूर्य सायन तुलादि तीन राशियों में हो तो इस धनु को ६ राशियों में जोड़ने से जो कुछ आवेगा वह मध्यान्हकालिक सूर्य का स्फुट सायन भोगांश होगा । और यदि सूर्य सायन मकर आदि तीन राशियों में हो तो इस धनु को १२ राशियों में घटाने जो पर कुछ आवेगा वह मध्यान्हकालिक सूर्य का सायन भोगांश होगा । इस स्फुट सायन भोगांश में मंद फल का उल्टा संस्कार कई बार करने से मध्यम सायन भोगांश निकलेगा । विज्ञान भाष्य — १४-१५ श्लोकों में सूर्य के मध्यान्हकालिक नतांश और क्रान्ति को जोड़ या घटाकर अक्षांश जानने की रीति बतलायी गयी है । १७वें श्लोक में अक्षांश और नतांश जान कर क्रान्ति निकालने की रीति है । इसलिए यह पहली रीति का ही दूसरा रूप है और जैसे वहाँ जोड़ना घटाना पड़ता है वैसे ही यहाँ भी । इसका कारण भी चित्र ५६ के संबंध के तीन समीकरणों से समझ में आ सकता है । जोड़ने और घटाने का नियम इस समीकरण से सरलतापूर्वक समझ में आ जायगा — अ ± न = क जिसमें अ, न और क क्रम से अक्षांश, नतांश और क्रान्ति सूचित करते हैं, धन का चिह्न उस समय लिखा जायगा जब अक्षांश और नतांश की दिशाएँ भिन्न होंगी अन्यथा ऋण का चिह्न प्रयोग होगा । यहाँ एक बात का ध्यान रखना आवश्यक है । यह बात साधारणतः लोग समझते हैं और आजकल यही प्रथा भी है कि उत्तर
२६६ सूर्य-सिद्धान्त गोल में अक्षांश की दिशा उत्तर समझी जाती है परन्तु इस नियम में इसकी दिशा दक्षिण समझी गयी है क्योंकि उत्तर गोल में खस्वस्तिक से विषुवद्वृत्त की दिशा दक्षिण होती है । क्रान्ति जब मालूम हो गयी तब सूर्य का भोगांश स्पष्टाधिकार के २८वें श्लोक से ही जाना जा सकता है; क्योंकि वहाँ बतलाया गया है (देखो पृष्ठ १२२ चित्र २५) कि ज्या ( व स ) × १३६७ ———————————— = ज्या ( स प ) ३४३८ ज्या ( स प ) × ३४३८ इसलिए ज्या (व स)= ————————————— (१) १३६७ जहाँ व स सूर्य का सायन भोगांश, स प सूर्य की क्रान्ति, और १३६७ सूर्य की परम क्रान्ति की ज्या है । यही १७वें श्लोक के अंतिम चरण और १८वें श्लोक के पूर्वार्द्ध का रूप है । यदि आजकल की रीति से ज्या का मान दशमलव भिन्न में व्यवहार किया जाय तो और भी सरल रूप यह होगा— ज्या ( स प ) ज्या ( व स )= ———————— (२) ज्या ( स व प ) अब यह अच्छी तरह सिद्ध हो गया कि सूर्य की परम क्रान्ति २४° नहीं है वरन् इसका मध्य मान इस समय २३°२७' के लगभग है और प्रतिवर्ष आधा विकला के लगभग घटती जा रही है । इसलिए यदि आजकल सूर्य की क्रांति से भोगांश जानना हो तो ∠ स व प को २३° २७' के समान समझ कर गणना करनी चाहिए । उदाहरण—एक दिन मध्यान्ह काल में सूर्य की क्रान्ति १६°१७' दक्षिण है और यह सायन मकरादि राशि में है तो इसका स्फुट सायन भोगांश बतलाओ । ज्या ( क्रान्ति ) ज्या ( भोगांश )= ————————— ज्या (परम क्रान्ति) ज्या १६° १७' = ———————— ज्या २३° २७' .२८०४ = ———— .३६७६ = .७०४७ ∴ भोगांश = ४४°, ४८'
त्रिप्रश्नाधिकार २६७ सूर्य सायन मकरादि में है इसलिए इस भोगांश को १२ राशि या ३६०° से घटाने पर जो आवेगा वह सूर्य का स्पष्ट सायन भोगांश होगा । इसलिए इस दिन सूर्य का सायन भोगांश = ३६०° - ४४°४८' = ३१५° १२' पृष्ठ २०० के चित्र ३६ को देखने से तथा अनुभव से भी यह स्पष्ट है कि सूर्य जितने समय में वसंत संपात से दक्षिणायन बिंदु तक जाता है अर्थात् सायन मेष से तीन राशि तक जाता है उतने समय में इसकी उत्तर क्रान्ति शून्य से २३°२७' तक बढ़ती है। जब सूर्य दक्षिणायन बिंदु से (सायन कर्क के आदि से) शरद सम्पात तक जाता है तब इसकी उत्तर क्रान्ति २३°२७' से घटते-घटते शून्य हो जाती है । शरद सम्पात् अर्थात् सायन तुला से उत्तरायण बिंदु (सायन मकर के आरंभ तक) सूर्य की दक्षिण क्रान्ति शून्य से २३°२७' बढ़ती रहती है और सायन मकर के आरम्भ से वसन्त सम्पात तक घटते-घटते फिर शून्य हो जाती है । ऊपर भोगांश निकालने का जो नियम बतलाया गया है उससे केवल यह जाना जाता है कि वसंत या शरद सम्पात से सूर्य कितनी दूर है। यदि सूर्य वसंत संपात अर्थात् सायन मेष से तीन राशियों के बीच में है तो आया हुआ भोगांश वसंत संपात से ही सूर्य की दूरी है, इसलिए यही सायन भोगांश हुआ । यदि सूर्य सायन कर्क के आरम्भ से तीन राशियों के भीतर है तो आया हुआ भोगांश शरद सम्पात से विलोम दिशा में सूर्य की दूरी है। परन्तु शरद सम्पात सायन मेष से ६ राशि दूर है इसलिए ६ राशि में से आया हुआ भोगांश घटाना पड़ता है तब वसंत सम्पात से सूर्य का सायन भोगांश निकलता है। यदि सूर्य सायन तुला से तीन राशियों के बीच में है तो आया हुआ भोगांश शरद सम्पात से अनुलोम दिशा में सूर्य की दूरी है इसलिए ६ राशि में यह जोड़ना पड़ता है तब सूर्य का वसंत सम्पात से सायन भोगांश निकलता है। और यदि सूर्य सायन मकर से तीन राशियों के बीच में है तो आया हुआ भोगांश वसंत संपात से विलोम दिशा में सूर्य की दूरी है। इसलिए १२ राशियों में से इस भोगांश को घटाने पर वसंत संपात से अनुलोम दिशा में सूर्य की दूरी (भोगांश) आती है। ऊपर बतलाया गया है कि सूर्य की परमक्रान्ति वर्ष में आधी विकला के लगभग घटती जा रही है। यहाँ वह सूत्र दे देना अच्छा होगा जिससे किसी समय परमक्रान्ति सहज ही जानी जा सकती है।
२६८ सूर्य-सिद्धान्त १६८० विक्रमीय की मेष संक्रान्ति के दिन मध्यम परमक्रान्ति २३° २६′५७″.३५ है। यह प्रति वर्ष ०″.४६८ विकला की दर से घटती है इसलिए मध्यम परमक्रान्ति का सूत्र = २३°२६′५७″.३५ - ०″.४६८ (व-१६८०) यहाँ 'व' किसी विक्रमीय संवत् की संख्या है। अयनांश का विचार करते समय यह कहा गया था कि अक्ष विचलन (Nutation) के कारण क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच के कोण अर्थात् परमक्रान्ति पर भी प्रभाव पड़ता है। इसके कारण परमक्रान्ति का स्पष्ट मान इस सूत्र के अनुसार होगा— २३°२६′५७″.३५-०″.४६८ (व-१६८०)+६″.२१ कोज्या (सायन राहु) + ०″.५५ कोज्या (२ सायन सूर्य) वसंत संपात बिंदु से राहु के भोगांश को सायन राहु और सूर्य के भोगांश को सायन सूर्य कहा गया है। इस रीति से सूर्य का जो स्पष्ट सायन भोगांश निकलता है उससे अयनांश का मान घटा देने पर निरयन भोगांश अर्थात् अश्विनी के आदि से सूर्य की दूरी आ जाती है। यही सूर्य का स्पष्ट स्थान हुआ जिसको गणित से जानने की रीति स्पष्टा- धिकार में बतलायी गयी है। जैसे स्पष्टाधिकार में मंदफल का संस्कार करने पर मध्यम सूर्य से स्पष्ट सूर्य निकलता है वैसे ही इस रीति से आये हुये स्पष्ट सूर्य में मंदफल का उलटा संस्कार करने पर मध्यम सूर्य आता है। परन्तु स्पष्टाधिकार के विज्ञान भाष्य में बतलाया गया है कि मध्यम सूर्य में केवल सिद्धान्तीय रीति से मंदफल का संस्कार देने से वेध सिद्ध स्पष्ट सूर्य नहीं निकलता इसलिए यह सिद्ध है कि इस अध्याय के १७-१६ श्लोकों की रीति से जो स्पष्ट सूर्य निकलता है उसमें सिद्धान्तीय रीति के मंदफल का उलटा संस्कार करने पर मध्यम सूर्य नहीं आ सकता। इसीलिये असकृत्कर्म करने को कहा गया है अर्थात् एक बार मंदफल का उलटा संस्कार देने से जो मध्यम सूर्य आवे उसको ही स्पष्ट सूर्य समझ कर फिर मंदफल का संस्कार करे। इससे जो मध्यम सूर्य आवे उसमें फिर मंदफल का संस्कार करे। इस तरह कई बार करने पर मध्यम सूर्य आ जावेगा। मध्यान्हकाल की छाया और छायाकर्ण जानना (सूर्य की क्रान्ति और अक्षांश से)— स्वाक्षार्कपक्रमयुतिः दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा । शेषं नतांशास्सूर्यस्य तद्बाहुज्याऽथ कोटिजा ॥२०॥
सूर्य-सिद्धान्त २६६ शंकुमानांगुलाभ्यस्ते भुजत्रिज्ये यथाक्रमम् । कोटिज्यया विभज्याऽऽप्ते छायाकर्णावहर्दले ॥२१॥ अनुवाद—(२०) अपने स्थान का अक्षांश और मध्याह्नकाल के सूर्य की क्रान्ति यदि एक ही दिशा में हो तो जोड़ दो और भिन्न दिशा में हों तो घटा दो । जो कुछ आवेगा वही सूर्य का मध्यान्हकालिक नतांश होगा। इसकी भुजज्या और कोटिज्या बनाओ । (२१) शंकु के अंगुलात्मक मान को अर्थात् १२ को भुज (नतांश की भुजज्या) से गुणा करके कोटिज्या से भाग देने पर लब्धि मध्यान्ह की छाया तथा शंकु को त्रिज्या से गुणा करके कोटिज्या से भाग देने पर मध्यान्ह का छायाकर्ण ज्ञात होगा । विज्ञान भाष्य—यह १४वें श्लोक का विलोम है। इन दोनों श्लोकों का सरल रूप यह है— अ ± क = न (१) छाया = ज्या (न) × १२ / कोज्या (न) (२) छायाकर्ण = त्रिज्या × १२ / कोज्या (न) (३) जहां अ अक्षांश, क सूर्य की मध्यान्हकालिक क्रान्ति और न सूर्य का मध्यान्ह- कालिक नतांश है । समीकरण (१) में धन का चिह्न उस समय लिखना चाहिए जब अक्षांश और क्रान्ति की दिशाएं एक ही हों और ऋण का चिह्न उस समय जब इनकी दिशाएँ भिन्न हों । अक्षांश की दिशा उत्तर गोल में सदैव दखिन समझी गयी है जिसकी व्याख्या पहले की जा चुकी है । १५वें श्लोक के भाष्य में बतलाया जा चुका है कि शंकु और छायाकर्ण के बीच के कोण को नतांश कहते हैं । इसलिये नतांश ज्या = छाया / छायाकर्ण वर्तमान प्रथानुसार (क) नतांश कोटिज्या = शंकु / छायाकर्ण (ख) ∵ छाया = नतांशज्या × छायाकर्ण = नतांश ज्या × शंकु / नतांश कोटिज्या = ज्या (न) × १२ / कोज्या (न)
२७० सूर्य-सिद्धान्त यदि स्पर्शरेखा की सारिणी से काम लिया जाय तो इसका सरल रूप यह होगा— छाया = १२ × स्परे (न) (४) ऊपर के समीकरण (ख) से सिद्ध है कि छायाकर्ण = शंकु / नतांश कोटिज्या वर्तमान प्रथानुसार यदि नतांश कोटिज्या का मान भारतीय प्रथानुसार लिखा जाय तो छायाकर्ण = शंकु × त्रिज्या / नतांश कोटिज्या अथवा छायाकर्ण = १२ × त्रिज्या / कोज्या (न) उदाहरण—किसी दिन सूर्य की उत्तर क्रान्ति १५°२५' और प्रयाग का अक्षांश २५°२५' है तो प्रयाग में इस दिन मध्याह्नकाल में छाया और छायाकर्ण क्या होंगे ? [देखो १४-१५ श्लोक का उदाहरण] प्रयाग उत्तर गोल में है, इसलिए इसके अक्षांश की दिशा श्लोकों के नियम के अनुसार दखिन है और क्रान्ति की दिशा उत्तर है इसलिए इन दोनों का अंतर ही सूर्य का नतांश होगा । ∵ न = २५°२५' - १५°२५' = १०° (१) सिद्धान्त की रीति से :— छाया = ज्या (न) × १२ / कोज्या (न) = ज्या १०° × १२ / कोज्या १०° = ५६७ × १२ / ३३८४ = २.१२ अंगुल छायाकर्ण = १२ × त्रिज्या / नतांश कोटिज्या = १२ × ३४३८ / ३३८४ = १२.१६ अंगुल
त्रिप्रश्नाधिकार २७१ (२) नवीन रीति से : — छाया = १२ × स्परे १०° = १२ × ·१७६३ अंगुल = २·११५६ = २·१२ अंगुल छायाकर्ण = १२ / कोज्या १०° = १२ / .९८४८ = १२·१६ अंगुल सूर्य की क्रान्ति और किसी इष्टकाल की छाया जानकर दिशा जानना— क्रान्तिज्या विषुवत्कर्णहताऽऽप्ता शंकुजीवया । अर्कग्रा सेऽष्टकर्णघ्ना मध्यकर्णोद्धृता स्वका ॥२२॥ विषुवद्भायुताऽर्काग्रा याम्ये स्यादुत्तरो भुजः । विषुवद्भा विशोध्योदग्गोले स्याद्बाहुहत्तरः ॥२३॥ विपर्ययाद् भुजो याम्यो भवेत्पूर्वापरान्तरे । माध्याह्निके भुजो नित्यं छाया माध्याह्न्निकी मता ॥२४॥ अनुवाद—(२२) सूर्य की क्रान्ति की ज्या को विषुवत्कर्ण से गुणा करके शंकु रूपी जीवा अर्थात् १२ से भाग देने पर सूर्य की उदयकालिक अग्रा आती है । इसको इष्टकाल के छायाकर्ण से गुणा करके मध्यकर्ण अर्थात् त्रिज्या से भाग देने पर इष्ट- काल की कर्णाग्रा अथवा कर्णवृत्ताग्रा आती है । (२३) यदि सूर्य दक्षिण गोल में हो अर्थात् यदि सूर्य की क्रान्ति दक्षिण हो तो कर्णाग्रा में पलभा जोड़ देने से और यदि सूर्य उत्तर गोल में हो तो पलभा से कर्णाग्रा घटा देने पर उत्तर भुज आता है । (२४) यदि सूर्य उत्तर गोल में हो और पलभा कर्णाग्रा से छोटी हो तो विपरीत क्रिया करने से अर्थात् कर्णाग्रा से पलभा घटाने पर दक्षिण भुज आता है । मध्याह्न में जो छाया होती है वही सदैव मध्याह्नकालिक भुज है । विज्ञान भाष्य—इसी अधिकार के ५वें और ७वें श्लोकों के विज्ञान भाष्य में अग्रा और अग्राज्या की चर्चा हुई है । ७वें श्लोक में अग्रा की परिभाषा यह बतलाई गई है, "इष्ट छाया की नोक से विषुवद्भाग्रा रेखा का जो अंतर होता है वह अग्रा कहलाती है" । चित्र ४५, ४६, के वर्णन में छ अ अग्राज्या और छ भ भुज बतलाये गये हैं । परंतु छ अ को अग्रा या अग्राज्या कहने से बहुत गड़बड़ हो जाने का डर है इसलिए छ अ को जिसे ७वें श्लोक में अग्रा और विज्ञान भाष्य में मैंने