भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

पृष्ठ 282, कुल 838 में से

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त्रिप्रश्नाधिकार २५६ परंतु भूकेन्द्र से सूर्य का अन्तर भर प्रायः ६ करोड़ २६ लाख मील है और पृथ्वी का अर्द्धव्यास भ स अथवा भ श (क्योंकि स श = १२ अंगुल) ४००० मील है। इसलिए ∠श र भ इतना छोटा कोण है कि यह शून्य माना जा सकता है (यथार्थ में यह कोण ६ विकला के लगभग होता है) । इसलिए < स श छ = < र भ श = < व भ स = अक्षांश अर्थात् शंकु और विषुवत्कर्ण के बीच का कोण अक्षांश के समान होता है। इसलिए पलभा और विषुवत्कर्ण के बीच का कोण जो पहले का पूरक कोण होता है लम्बांश के समान हुआ। उदाहरण—प्रयाग की पलभा ५ अंगुल ४१ व्यंगुल अथवा ५.६८ अंगुल है तो प्रयाग का अक्षांश बतलाओ । प्रयाग का विषुवत्कर्ण = √शंकु² + पलभा² = √१२² + (५.६८)² = √१४४ + ३२.२६ = √१७६.२६ = १३.२८ अंगुल ∵ प्रयाग की अक्षज्या पलभा × त्रिज्या = ———————— विषुवत्कर्ण ५.६८ × ३४३८ = ———————— १३.२८ = १४७०.५ कला इसलिए ज्याओं की सारिणी (पृष्ठ १२०-१२१) तथा स्पष्टाधिकार के श्लोक ३३ (पृष्ठ १३०) के अनुसार अक्षांश = २५°२१′ अक्षांश जानने की दूसरी रीति— मध्यच्छाया भुजस्तेन गुणिता त्रिभमौर्विका । तत्कर्णाप्तधनुर्लिप्ता नतास्ता दक्षिणे भुजे ॥१४॥ उत्तराश्चोत्तरे याम्यास्तत्सूर्यक्रान्तिलिप्तिका । दिग्भेदे मिश्रितास्साम्ये विश्लिष्टाश्चाक्षलिप्तिकाः ॥१५॥

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