भारतकोश
सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

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२६२ सूर्य-सिद्धान्त नतांश ज्या = (छाया × त्रिज्या) / छायाकर्ण [ सिद्धान्तीय रीति के अनुसार ] नतांश की ज्या से नतांश निकाल कर इसको सूर्य की क्रान्ति में जो स्पष्टा- धिकार के श्लोक २८ के अनुसार जानी जा सकती है, जोड़ने या घटाने से, जैसी आवश्यकता हो, अक्षांश निकल आता है। उदाहरण—यदि किसी दिन सूर्य की उत्तर क्रान्ति १५.२५ और इसी दिन प्रयाग में शंकु की मध्याह्न छाया २.१२ अंगुल हो तो प्रयाग का अक्षांश बतलाओ । प्रयाग का मध्याह्न छायाकर्ण = √(शंकु² + छाया²) = √(१२² + (२.१२)²) = √१४८.४६ = १२.१६ अंगुल ∵ नतांश ज्या = (छाया × त्रिज्या) / छायाकर्ण = (२.१२ × ३४३८) / १२.१६ = ५६८' इसलिए नतांश = ६° ५१' यह नतांश दखिन की ओर है और सूर्य की क्रान्ति उत्तर है । इसलिए दोनों का योग प्रयाग का अक्षांश होगा । इसलिए इस रीति से प्रयाग का अक्षांश = ६° ५१' + १५° २५' = २५° १६' दोनों रीतियों से निकाले गये अक्षांशों में कुछ अन्तर है । इसका कारण प्रत्यक्ष है । छाया की नाप स्थूल होती है जिसका कारण पहले बतलाया जा चुका है। यदि छाया छोटी हो तो अशुद्धि और भी बढ़ जाती है । पलभा जानने की दूसरी रीति यदि अक्षांश ज्ञात हो— तज्ज्याऽक्षज्याऽथ तद्वर्गं प्रोज्झ्य त्रिज्याकृतेः पदम् । लम्बज्याऽक्षगुणोऽर्कघ्नः पलभाप्तोऽवलम्बकः ॥१६॥ अनुवाद—(१६) ऊपर बतलायी गयी रीति से अक्षांश जानकर अक्षज्या बनाओ और अक्षज्या के वर्ग को त्रिज्या के वर्ग से घटाकर शेष का वर्गमूल निकालो