सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६८ सूर्य-सिद्धान्त १६८० विक्रमीय की मेष संक्रान्ति के दिन मध्यम परमक्रान्ति २३° २६′५७″.३५ है। यह प्रति वर्ष ०″.४६८ विकला की दर से घटती है इसलिए मध्यम परमक्रान्ति का सूत्र = २३°२६′५७″.३५ - ०″.४६८ (व-१६८०) यहाँ 'व' किसी विक्रमीय संवत् की संख्या है। अयनांश का विचार करते समय यह कहा गया था कि अक्ष विचलन (Nutation) के कारण क्रान्तिवृत्त और विषुवद्वृत्त के बीच के कोण अर्थात् परमक्रान्ति पर भी प्रभाव पड़ता है। इसके कारण परमक्रान्ति का स्पष्ट मान इस सूत्र के अनुसार होगा— २३°२६′५७″.३५-०″.४६८ (व-१६८०)+६″.२१ कोज्या (सायन राहु) + ०″.५५ कोज्या (२ सायन सूर्य) वसंत संपात बिंदु से राहु के भोगांश को सायन राहु और सूर्य के भोगांश को सायन सूर्य कहा गया है। इस रीति से सूर्य का जो स्पष्ट सायन भोगांश निकलता है उससे अयनांश का मान घटा देने पर निरयन भोगांश अर्थात् अश्विनी के आदि से सूर्य की दूरी आ जाती है। यही सूर्य का स्पष्ट स्थान हुआ जिसको गणित से जानने की रीति स्पष्टा- धिकार में बतलायी गयी है। जैसे स्पष्टाधिकार में मंदफल का संस्कार करने पर मध्यम सूर्य से स्पष्ट सूर्य निकलता है वैसे ही इस रीति से आये हुये स्पष्ट सूर्य में मंदफल का उलटा संस्कार करने पर मध्यम सूर्य आता है। परन्तु स्पष्टाधिकार के विज्ञान भाष्य में बतलाया गया है कि मध्यम सूर्य में केवल सिद्धान्तीय रीति से मंदफल का संस्कार देने से वेध सिद्ध स्पष्ट सूर्य नहीं निकलता इसलिए यह सिद्ध है कि इस अध्याय के १७-१६ श्लोकों की रीति से जो स्पष्ट सूर्य निकलता है उसमें सिद्धान्तीय रीति के मंदफल का उलटा संस्कार करने पर मध्यम सूर्य नहीं आ सकता। इसीलिये असकृत्कर्म करने को कहा गया है अर्थात् एक बार मंदफल का उलटा संस्कार देने से जो मध्यम सूर्य आवे उसको ही स्पष्ट सूर्य समझ कर फिर मंदफल का संस्कार करे। इससे जो मध्यम सूर्य आवे उसमें फिर मंदफल का संस्कार करे। इस तरह कई बार करने पर मध्यम सूर्य आ जावेगा। मध्यान्हकाल की छाया और छायाकर्ण जानना (सूर्य की क्रान्ति और अक्षांश से)— स्वाक्षार्कपक्रमयुतिः दिक्साम्येऽन्तरमन्यथा । शेषं नतांशास्सूर्यस्य तद्बाहुज्याऽथ कोटिजा ॥२०॥