सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमध्यमाधिकार ५ ऽसाध्यग्रंथास्तत्काल वर्तमानाभियुक्ताः कुर्वन्ति । तदिदमन्तरं पूर्व ग्रंथे बीजमित्याम- नन्ति । पूर्वग्रंथानां लुप्तत्वात्सूर्यर्षि संवादोऽपीदानीं न दृश्यत इति । तदप्रसिद्धेरागम प्रामाण्याच्च नाशंक्या ।।'† काल पाकर अन्तर पड़ने के उदाहरण अनेक हैं, जो इसी टीका में उचित स्थान पर बतलाये जायेंगे । लोकानामन्तकृत्कालः कालोन्यः कलनात्मकः । स द्विधा स्थूल सूक्ष्मत्वान्मूर्त्तंश्चामूर्त्त उच्यते ॥१०॥ अनुवाद—एक प्रकार का कोल संसार को नाश करता है और दूसरे प्रकार का कलनात्मक है अर्थात् जाना जा सकता है। यह भी दो प्रकार का होता है—(१) स्थूल और (२) सूक्ष्म । स्थूल नापा जा सकता है, इसलिए मूर्त कहलाता है और सूक्ष्म नापा नहीं जा सकता इसलिए अमूर्त कहलाता है ॥१०॥ विज्ञान भाष्य—पहले प्रकार के काल की कल्पना भी नहीं हो सकती, क्योंकि न तो यही मालूम है कि वह कब से आरंभ हुआ और न यही मालूम होगा कि उसका अन्त कब होगा । यह अखंड और व्यापक है; परन्तु इसके बीच में ही अथवा इसके उपस्थित रहते ही लोक का अन्त हो जाता है, ब्रह्मा उत्पन्न होते, सृष्टि रचते तथा लय करते हैं, परन्तु काल बना ही रहता है। इसलिए इसको लोकों का अन्त कर देनेवाला, नाश कर देनेवाला, कहते हैं। इसीलिए मृत्यु को भी काल कहते हैं । काल का जो थोड़ा-सा मध्य भाग जाना जा सकता है; उसमें भी जो बहुत छोटा है वह नापा नहीं जा सकता है और अमूर्त कहलाता है। नापने में जितनी ही सूक्ष्मता होगी अमूर्त काल की परिभाषा भी नयी होती जायगी; जैसा कि अगले श्लोक की व्याख्या में दिखाया जायगा । प्राणादिः कथितो मूर्तः त्रुट्याद्योऽमूर्तसंज्ञकः । षड्भिःप्राणैः विनाड़ी स्यात्तत्षष्ट्या नाड़िका स्मृता ॥११॥ नाड़ी षष्ट्या तु नाक्षत्रमहोरात्रं प्रकीर्तितम् । तत्तिंशता भवेन्मासः सावनोऽर्कोदयैःस्मृतः ।।१२।। ऐन्दवस्तिथिभिः तद्वत्सङ्क्रान्त्या सौर उच्यते । मासैर्द्वादशभिर्वर्षं दिव्यं तदह उच्यते ।।१३।। अनुवाद—प्राण से लेकर ऊपर की जितनी समय की इकाइयाँ हैं वह मूर्त †वेंकटेश्वर प्रेस का १६५३ वि० का छपा सूर्य सिद्धान्त, पृष्ठ ७ ।